मुलायम सिंह यादव
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पूरा नाम
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मुलायम सिंह यादव
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जन्म
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जन्म भूमि
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अभिभावक
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पति/पत्नी
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स्व. मालती देवी (प्रथम पत्नी), साधना गुप्ता
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संतान
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अखिलेश यादव, प्रतीक यादव
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नागरिकता
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भारतीय
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प्रसिद्धि
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'किसान नेता' और 'धरतीपुत्र' के नाम से प्रसिद्ध
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पार्टी
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पद
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कार्य काल
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शिक्षा
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एम.ए., बी.टी.
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विद्यालय
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जेल यात्रा
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अन्य जानकारी
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वर्ष 1954 में मात्र 15
वर्ष की आयु में महान समाजवादी नेता डॉ. राम मनोहर लोहिया के आह्वान पर 'नहर रेट
आन्दोलन' में भाग लिया और पहली बार जेल गए।
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मुलायम
सिंह यादव (जन्म- 22 नवम्बर, 1939, इटावा, उत्तर प्रदेश) एक प्रसिद्ध राजनेता और उत्तर प्रदेश के
भूतपूर्व मुख्यमंत्री हैं। वे एक किसान नेता और जनता के
बीच 'नेताजी' तथा 'धरतीपुत्र' के नाम से भी जाने जाते हैं। मुलायम सिंह
तीन बार, 1989 से 1991 तक, 1993 से 1995 तक और 2003 से 2007 तक, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की गरिमा बढ़ा
चुके हैं। वे केंन्द्र सरकार में एक बार रक्षामंत्री के पद को भी सुशोभित कर चुके
हैं। भारत की 'समाजवादी
पार्टी' के वे अध्यक्ष हैं।
मुलायम सिंह यादव के विषय में चौधरी
चरण सिंह कहते थे-
"यह छोटे कद का बड़ा नेता है"।
परिचय
नवम्बर, 1939 को इटावा ज़िला, सैफई गाँव के एक किसान परिवार में मुलायम
सिंह यादव का जन्म हुआ था। उनकी माता का नाम 'मूर्ति
देवी' व पिता 'सुधर सिंह' थे।
मुलायम सिंह अपने पाँच भाई-बहनों में रतन सिंह से छोटे व अभयराम सिंह, शिवपाल सिंह यादव, रामगोपाल सिंह यादव और कमला देवी
से बड़े हैं। मुलायम सिंह के पिता उन्हें पहलवान बनाना चाहते थे। राजनीति में आने
से पूर्व मुलायम सिंह ने आगरा विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर (एम.ए.) और जैन इन्टर
कालेज, करहल (मैनपुरी) से बी. टी. कि डिग्री प्राप्त की थी।
इसके बाद उन्होंने कुछ दिनों तक इन्टर कॉलेज में अध्यापन कार्य भी किया।
विवाह
मुलायम
सिंह जी का प्रथम विवाह मालती देवी के साथ हुआ था। उनके
पुत्र अखिलेश यादव का जन्म इन्हीं के गर्भ से 1 जुलाई, 1973 को हुआ। लेकिन अखिलेश यादव के बाल्यकाल में ही मालती देवी का स्वर्गवास हो
गया। इसके बाद मुलायम सिंह यादव का दूसरा विवाह साधना गुप्ता के साथ सम्पन्न हुआ,
जिनसे इन्हें प्रतीक यादव के रूप में दूसरे पुत्र रत्न की प्राप्ति
हुई।
राजनीति में प्रवेश
'समाजवादी पार्टी'
के नेता मुलायम सिंह यादव पिछले तीन दशक से राजनीति में सक्रिय हैं।
अपने राजनीतिक गुरु नत्थूसिंह को मैनपुरी में आयोजित एक कुश्ती प्रतियोगिता में
प्रभावित करने के पश्चात मुलायम सिंह ने नत्थूसिंह के परम्परागत विधान सभा क्षेत्र जसवन्त
नगर से ही अपना राजनीतिक सफर आरम्भ किया था। मुलायम सिंह यादव जसवंत नगर और फिर इटावा की सहकारी बैंक
के निदेशक चुने गए थे। विधायक का चुनाव भी 'सोशलिस्ट पार्टी' और फिर 'प्रजा
सोशलिस्ट पार्टी' से लड़ा था। इसमें उन्होंने विजय भी
प्राप्त की। उन्होंने स्कूल के अध्यापन कार्य से इस्तीफा दे दिया था। पहली बार
मंत्री बनने के लिए मुलायम सिंह यादव को 1977 तक इंतज़ार करना पड़ा, जब कांग्रेस विरोधी लहर में
उत्तर प्रदेश में भी जनता सरकार बनी थी। 1980 में भी कांग्रेस की सरकार में वे राज्य मंत्री रहे और फिर चौधरी चरण सिंह
के लोकदल के अध्यक्ष बने और विधान सभा चुनाव हार गए। चौधरी साहब ने विधान परिषद में मनोनीत
करवाया, जहाँ वे प्रतिपक्ष के नेता भी रहे।
लोकप्रियता
1967 में मुलायम सिंह पहली बार उत्तर प्रदेश, विधान सभा के लिए
चुने गए थे। शुरुआत से ही मुलायम सिंह यादव दलितों और पिछड़े वर्गों से जुड़े
मुद्दे उठाते रहे और आज भी यह वर्ग उनका सबसे बड़ा आधार हैं, जहाँ उन्हें बहुत लोकप्रियता प्राप्त है। अयोध्या में बाबरी
मस्जिद के मुद्दे पर हिन्दू कट्टरपंथी संगठनों
के उनके मुखर विरोध ने मुलायम सिंह को मुस्लिम समुदाय में भी
लोकप्रिय बना दिया। 1992 में बाबरी मस्जिद टूटने के बाद उत्तर प्रदेश की राजनीति सांप्रदायिक आधार
पर बँट गई और मुलायम सिंह को राज्य के मुस्लिमों का समर्थन हासिल हुआ।
अल्पसंख्यकों के प्रति उनके रुझान को देखते हुए कहीं-कहीं उन पर "मौलाना
मुलायम" का ठप्पा भी लगा।[2]
मुख्यमंत्री
सन 1989 में जब उत्तर प्रदेश सरकार का गठन होने वाला था, तब
मुख्यमंत्री पद की दौड़ में दो नेता थे- मुलायम सिंह और अजित सिंह। मुलायम सिंह
जनाधार वाले नेता थे, जबकि अजित सिंह अमेरिका से लौटे थे। वी. पी. सिंह हर हाल में अजित
सिंह को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाना चाहते थे। मुलायम सिंह को यह मंजूर
नहीं था। मुख्यमंत्री का नाम तय करने के लिए गुजरात के समाजवादी
नेता और पूर्व मुख्यमंत्री चिमनभाई पटेल को लखनऊ भेजा गया। वे उस
समय उत्तर प्रदेश के जनता दल प्रभारी थे। वी.
पी. सिंह का दबाव उनके ऊपर था कि अजित को फाइनल करें। यहाँ मुलायम सिंह यादव ने
जबरदस्त राजनीतिक चातुर्य का प्रदर्शन किया। चिमनभाई पटेल ने लखनऊ से लौटते ही
मुलायम सिंह के नाम पर ठप्पा लगा दिया।
वर्ष 1993 में मुलायम सिंह यादव ने 'बहुजन समाज पार्टी' के साथ मिलकर उत्तर प्रदेश का विधानसभा चुनाव लड़ा था। हालांकि यह मोर्चा
जीता नहीं, लेकिन 'भारतीय जनता पार्टी' भी सरकार बनाने से चूक गई। मुलायम सिंह यादव ने कांग्रेस और जनता दल
दोनों का साथ लिया और फिर मुख्यमंत्री बन गए। जून 1995 तक वे मुख्यमंत्री रहे और उसके बाद
कांग्रेस ने समर्थन वापस ले लिया।
मुलायम सिंह यादव तीसरी बार 2003 में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने और विधायक बनने के लिए उन्होंने 2004 की जनवरी में गुन्नौर सीट
से चुनाव लड़ा था, जहाँ उन्होंने रिकॉर्ड बहुमत से विजय
प्राप्त की थी। कुल डाले गए मतों में से 92 प्रतिशत मत
उन्हें प्राप्त हुए थे, जो आज तक विधानसभा चुनाव का एक
शानदार रिकॉर्ड है।[3]
प्रधानमंत्री पद के दावेदार
1996 में मुलायम सिंह यादव ग्यारहवीं लोकसभा के लिए मैनपुरी लोकसभा क्षेत्र से चुने
गए थे और उस समय जो संयुक्त मोर्चा सरकार बनी थी, उसमें
मुलायम सिंह भी शामिल थे और देश के रक्षामंत्री बने थे। यह सरकार बहुत लंबे समय तक
चली नहीं। मुलायम सिंह यादव को प्रधानमंत्री बनाने की भी बात
चली थी। प्रधानमंत्री पद की दौड़ में वे सबसे आगे खड़े थे, किंतु
उनके सजातियों ने उनका साथ नहीं दिया। लालू प्रसाद यादव और शरद यादव ने उनके इस
इरादे पर पानी फेर दिया। इसके बाद चुनाव हुए तो मुलायम सिंह संभल से लोकसभा में वापस लौटे।
असल में वे कन्नौज भी जीते थे,
किंतु वहाँ से उन्होंने अपने बेटे अखिलेश यादव को सांसद बनाया।[3]
केंद्रीय राजनीति
केंद्रीय
राजनीति में मुलायम सिंह का प्रवेश 1996 में हुआ, जब काँग्रेस पार्टी को हरा
कर संयुक्त मोर्चा ने सरकार बनाई। एच. डी. देवेगौडा के नेतृत्व वाली इस सरकार में वह रक्षामंत्री बनाए गए थे, किंतु यह सरकार भी ज़्यादा दिन चल नहीं पाई और तीन साल में भारत को दो प्रधानमंत्री देने के बाद
सत्ता से बाहर हो गई। 'भारतीय जनता पार्टी' के साथ उनकी विमुखता से लगता था, वह काँग्रेस के
नज़दीक होंगे, लेकिन 1999 में उनके समर्थन का आश्वासन ना मिलने पर काँग्रेस सरकार बनाने में असफल
रही और दोनों पार्टियों के संबंधों में कड़वाहट पैदा हो गई। 2002 के उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव
में समाजवादी पार्टी ने 391 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े
किए, जबकि 1996 के चुनाव में उसने केवल
281 सीटों पर ही चुनाव लड़ा था।
राजनीतिक दर्शन तथा विदेश यात्रा
मुलायम
सिंह यादव की राष्ट्रवाद, लोकतंत्र, समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता के सिद्धान्तों में अटूट आस्था रही है। भारतीय
भाषाओं, भारतीय संस्कृति और शोषित पीड़ित वर्गों के हितों के
लिए उनका अनवरत संघर्ष जारी रहा है। उन्होंने ब्रिटेन, रूस, फ्रांस, जर्मनी, स्विटजरलैण्ड,
पोलैंड और नेपाल आदि देशों की भी
यात्राएँ की हैं।
लोकसभा सदस्य
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सदस्यता
§ विधान
परिषद 1982-1985
§ विधान
सभा 1967,
1974, 1977, 1985, 1989, 1991, 1993 और 1996 (आठ
बार)
§ विपक्ष
के नेता, उत्तर प्रदेश विधान परिषद 1982-1985
§ विपक्ष
के नेता, उत्तर प्रदेश विधान सभा 1985-1987
केंद्रीय
कैबिनेट मंत्री
§ सहकारिता
और पशुपालन मंत्री 1977
§ रक्षा
मंत्री 1996-1998
भाजपा
से नजदीकी
मुलायम सिंह यादव मीडिया को कोई भी ऐसा मौका नहीं देते, जिससे कि उनके ऊपर 'भाजपा' के क़रीबी होने का
आरोप लगे। जबकि राजनीतिक हलकों में यह बात मशहूर है कि अटल बिहारी वाजपेयी से उनके व्यक्तिगत रिश्ते बेहद मधुर थे। वर्ष 2003 में उन्होंने भाजपा के अप्रत्यक्ष सहयोग से ही प्रदेश में अपनी सरकार बनाई
थी। अब 2012 में उनका आकलन सच भी साबित हुआ। उत्तर प्रदेश में 'समाजवादी पार्टी' को अब तक की सबसे बड़ी जीत हासिल हुई है। 45 मुस्लिम विधायक उनके दल
में हैं।
पुरस्कार व सम्मान
पूर्व मुख्यमंत्री एवं समाजवादी
पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव को 28
मई, 2012 को लंदन में 'अंतर्राष्ट्रीय जूरी पुरस्कार' से सम्मानित किया
गया। इंटरनेशनल काउंसिल ऑफ़ जूरिस्ट की जारी विज्ञप्ति में हाईकोर्ट ऑफ़ लंदन के
सेवानिवृत न्यायाधीश सर गाविन लाइटमैन ने बताया कि श्री यादव का इस पुरस्कार के
लिये चयन बार और पीठ की प्रगति में बेझिझक योगदान देना है। उन्होंने कहा कि श्री
यादव का विधि एवं न्याय क्षेत्र से जुड़े लोगों में भाईचारा पैदा करने में सहयोग
दुनियाभर में लाजवाब है।
ज्ञातव्य है कि मुलायम सिंह यादव ने विधि क्षेत्र में ख़ासा योगदान
दिया है। समाज में भाईचारे की भावना पैदाकर मुलायम सिंह यादव का लोगों को न्याय
दिलाने में विशेष योगदान है। उन्होंने कई विधि विश्वविद्यालयों में भी
महत्त्वपूर्ण योगदान किया है।
मुलायम सिंह पर पुस्तकें
मुलायम सिंह पर कई पुस्तकें भी लिखी जा चुकी हैं। इनमें पहली पुस्तक
का नाम 'मुलायम सिंह यादव- चिन्तन और विचार' का है, जिसे अशोक कुमार शर्मा ने सम्पादित किया था।
इसके अतिरिक्त राम सिंह तथा अंशुमान यादव द्वारा लिखी गयी 'मुलायम
सिंह: ए पॉलिटिकल बायोग्राफ़ी' अब उनकी प्रमाणिक जीवनी है। लखनऊ की पत्रकार डॉ.
नूतन ठाकुर ने भी मुलायम सिंह यादव के सामाजिक, सांस्कृतिक
और राजनीतिक महत्व को रेखांकित करते हुए एक पुस्तक लिखने का कार्य किया है।
राजनीतिक सफर
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क्र.स.
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विवरण
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1.
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वर्ष 1954 में
मात्र 15 वर्ष की आयु में महान समाजवादी नेता डॉ. राम मनोहर लोहिया के आह्वान पर 'नहर रेट आन्दोलन' में भाग लिया और पहली बार जेल
गए।
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2.
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वर्ष 1967 में
संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर प्रथम बार उत्तर प्रदेश विधान सभा के सदस्य
चुने गये।
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3.
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4.
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वर्ष 1977-1978 में श्री राम नरेश यादव और श्री बनारसी दास मंत्रिमण्डल
में सहकारिता एवं पशुपालन मंत्री बनाए गए।
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5.
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तीन बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे - वर्ष 1989 से 1991
तक, वर्ष 1993 से 1995
तक और वर्ष 2003 से 2007 तक।
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6.
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7.
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8.
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9.
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प्रधानमंत्री श्री एच. डी. देवेगौडा और श्री इन्द्र कुमार गुजराल की सरकारों
में 1996 से 1998 तक भारत के
रक्षामंत्री का पदभार सम्भाला।
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10.
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11.
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समाजवादी पार्टी की स्थापना से पूर्व मुलायम सिंह यादव उत्तर
प्रदेश लोकदल और उत्तर प्रदेश जनता दल के अध्यक्ष रहे थे।
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12.
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13.
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मुलायम सिंह यादव स्वतंत्रता के बाद आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक न्याय के क्षेत्र
में संघर्ष करने वाले चौधरी चरण सिंह के उत्तराधिकारी हैं। वे डॉ. भीमराव अम्बेडकर के भी उत्तराधिकारी हैं और खुले दिमाग के एक संघर्षशील समाजवादी
कार्यकर्ता के रूप में राम मनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण, आचार्य नरेन्द्र देव, मधुलिमये और राज नारायण, इन सबके विचारों और राजनीतिक
प्रयोगों और प्रयासों के उत्तराधिकारी हैं। डॉ. लोहिया के विचारों पर 'समाजवादी पार्टी' का गठन करने वाले मुलायम सिंह यादव एक बार फिर से राजनीतिक चुनौतियों का
सामना करने के लिए कमर कस चुके हैं।[1]
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