देवगिरि का यादव वंश
यादव वंश भारतीय इतिहास में बहुत
प्राचीन है और यह अपना सम्बन्ध प्राचीन यदुवंशी क्षत्रियों से मानता है। राष्टकूटों और चालुक्यों के उत्कर्ष काल
में यादव वंश के राजा अधीनस्थ
सामन्त राजाओं की स्थिति रखते थे, लेकिन जब चालुक्यों की
शक्ति क्षीण हुई तो वे स्वतंत्र हो गए और वर्त्तमान औरंगाबाद ज़िला, महाराष्ट्र राज्य, में स्थित देवगिरि (आधुनिक दौलताबाद) को केन्द्र बनाकर
उन्होंने अपने उत्कर्ष का प्रारम्भ किया। सुबाहु के पुत्र द्रिधाप्रहर कल्याणी के
चालुक्यों के सामंत थे| द्रिधाप्रहरा के पुत्र सुवनाचंद्र ने 850 ई० में यादव
साम्राज्य के स्थापना किये थे|
देवगिरि के यादव वंश का राज्यकाल 850 ई० से 1334 ई० तक
माना जाता है| इनका साम्राज्य इनके उत्कर्ष के समय तुंगभद्रा नदी से लेकर नर्मदा
नदी तक विस्तृत था, जिसके अंतर्गत वर्तमान महाराष्ट्र, उत्तरी कर्णाटक तथा
मध्यप्रदेश कुछ क्षेत्र आते थे| उनकी राजधानी देवगिरि (वर्तमान दौलताबाद) थी| वे
मराठी भाषा के महान संरक्षक माने जाते हैं| सिंघन द्वितीय के समय यह राजवंश अपने
उत्कर्ष पर था|
उत्पति
देवगिरि के
यादव अथवा सुवन शासक अपने को चंद्रवंशी यादवों के वंशज मानते थे| हेमाद्री रचित
‘वर्तखंड’ के अनुसार उनका उत्पति स्थान मथुरा था, जहाँ से कालांतर में वे द्वारिका
में बस गए थे| हेमाद्री ने उन्हें ‘कृष्णकुलउत्पन्न’ कहा है| मराठी संत दयानेश्वर
ने उन्हें ‘यदुकुलवंशतिलक’ कहा था| इस वंश के कुछ अभिलेखों में उन्हें
‘द्वारावातिपुरधिश्वर’ (द्वारावती या द्वारिका के स्वामी) कहा गया है|
इतिहासकार
रेनाल्ड एडवर्ड एन्थोवें का मत है की देवगिरि के यादव, अभीर जाति के थे| नासिक के पास से पाए
गए अजनेरी शिलालेख से यह पता चलता है कि देवगिरि के
यादव शासक प्राचीन यादव परिवार से सम्बंधित थे |
[डॉ. ओपी वर्मा के
अनुसार यादव मराठी वक्ता थे और उनके शासन की
अवधि मराठी के इतिहास के लिए बहुत स्वर्ण युग था |
साम्राज्य का उदय-
द्रिधाप्रहर
के पुत्र सुवनाचंद्र ने 850 ई० में यादव साम्राज्य के स्थापना किये थे| आरम्भिक
समय में उनकी राजधानी श्रीनगर थी| प्रारम्भिक अभिलेखों में उनकी राजधानी
चन्द्रदित्यपुर (आधुनिक- चन्दोर, जिला- नासिक) बताई गयी है| शुवनाचंद्र के नाम पर
ही इस राजवंश का नाम शुवन राजवंश पड़ा|
चालुक्यों की शक्ति क्षीण होने पर 1173 ई० में यादव राजा 'भिल्लम पंचम' ने अपने को स्वतंत्र शासक घोषित कर
दिया| 1187 ई. में इसने अन्तिम चालुक्य राजा सोमेश्वर चतुर्थ को परास्त कर कल्याणी पर भी अधिकार कर
लिया तथा देवगिरि (आधुनिक – दौलताबाद) को अपनी राजधानी बनाया |
भिल्लम पंचम 1173–1192 C.E
भिल्ल्म तथा बल्लाल का संघर्ष
1187 ई. में यादव राजा 'भिल्लम' ने अन्तिम चालुक्य राजा सोमेश्वर चतुर्थ को परास्त कर कल्याणी पर भी अधिकार कर
लिया। इसमें सन्देह नहीं कि भिल्लम एक अत्यन्त प्रतापी राजा था और उसी के
कर्त्तृत्व के कारण यादवों के उत्कर्ष का प्रारम्भ हुआ था। पर शीघ्र ही भिल्लम को
एक नए शत्रु का सामना करना पड़ा। द्वारसमुद्र (मैसूर) में यादव क्षत्रियों
के एक अन्य वंश का शासन था, जो होयसाल कहलाते थे।
चालुक्यों की शक्ति क्षीण होने पर दक्षिणापथ में जो स्थिति उत्पन्न हो गई थी,
होयसलों ने भी उससे लाभ उठाया और उनके राजा वीर बल्लाल द्वितीय ने
उत्तर की ओर अपनी शक्ति का विस्तार करते हुए भिल्लम के राज्य पर भी आक्रमण किया।
इस प्रकार बल्लाल और भिल्लम के मध्य एक ज़ोरदार संघर्ष हुआ। वीर बल्लाल के साथ
युद्ध करते हुए भिल्लम ने वीरगति प्राप्त की और उसके राज्य पर, जिसमें कल्याणी का प्रदेश भी शामिल था, होयसालों का
अधिकार हो गया। इस प्रकार 1191 ई. में भिल्लम द्वारा स्थापित
यादव राज्य का अन्त हुआ।
यादव अपने चारों तरफ से आक्रामक पड़ोसियों से घिरे हुए थे
| उनके उतर में मालवा के परमर शासक, दक्षिन में होयसल राजा, पूरब में काकतीय शासक
तथा पश्चिम में गुजरात के सोलंकी राजा थे| इन शत्रुओं से रक्षा के लिए यादवों ने
देवगिरि में एक विशाल एवं मजबूत दुर्ग का निर्माण किये| देवगिरि का किला 183 मी०
ऊँचे एक पहाड़ी पर बनाया गया था| किले के बाहरी दीवारों की परिधि 4.4 कि० मी० थी|
इस किले का निर्माण 1203 ई० में किया गया था |
जैत्रपाल की वीरता
भिल्लम की इस पराजय से यादव वंश की शक्ति का मूलोच्छेद
नहीं हो सका। भिल्लम का उत्तराधिकारी 'जैत्रपाल प्रथम'
था, जिसने अनेक युद्धों के द्वारा अपने वंश के
गौरव का पुनरुद्धार किया। होयसालों ने कल्याणी और देवगिरि पर स्थायी रूप
से शासन का प्रयत्न नहीं किया था, इसलिए जैत्रपाल को फिर से
अपने राज्य के उत्कर्ष का अवसर मिल गया। उसका शासन काल 1191 से
1210 तक था। अपने पड़ोसी राज्यों से निरन्तर युद्ध करते हुए
जैत्रपाल प्रथम ने यादव राज्य की शक्ति को भली-भाँति स्थापित कर लिया।
सिंघण द्वारा राज्य विस्तार
जैत्रपाल प्रथम का पुत्र 'सिंघण द्वितीय'
(1210-1247 ई.) था। वह इस वंश का सबसे शक्तिशाली प्रतापी राजा हुआ। 37
वर्ष के अपने शासन काल में उसने चारों दिशाओं में बहुत से युद्ध किए
और देवगिरि के यादव राज्य को उन्नति की चरम सीमा पर पहुँचा दिया। इनके समय यादव
साम्राज्य नर्मदा नदी से लेकर तुंगभद्रा नदी तक फैल गया था | होयसल राजा वीर
बल्लाल ने उसके पितामह भिल्लम को युद्ध में मारा था और यादव राज्य को बुरी तरह से
आक्रान्त किया था। अपने कुल के इस अपमान का प्रतिशोध करने के लिए सिंघण ने द्वारसमुद्र के होयसाल राज्य
पर आक्रमण किया और वहाँ के राजा वीर बल्लाल द्वितीय को परास्त कर उसके अनेक
प्रदेशों पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया। होयसल राजा कि विजय के बाद सिंघण ने उत्तर
दिशा में विजय यात्रा के लिए प्रस्थान किया। गुजरात पर उसने कई बार
आक्रमण किए और मालवा को अपने अधिकार
में लाकर काशी और मथुरा तक विजय यात्रा
की। इतना ही नहीं, उसने कलचुरी राज्य को परास्त कर अफ़ग़ान शासकों के साथ
भी युद्ध किए, जो उस समय उत्तर भारत के बड़े भाग को
अपने स्वामित्व में ला चुके थे।
कोल्हापुर के शिलाहार, बनवासी के कदम्ब और पांड्य देश के राजाओं
को भी सिंघण ने आक्रान्त किया और अपनी इन दिग्विजयों के उपलक्ष्य में कावेरी नदी के तट पर एक
विजय स्तम्भ की स्थापना की। इसमें सन्देह नहीं कि यादव राज सिंघण एक विशाल
साम्राज्य का निर्माण करने में सफल हुआ था और न केवल सम्पूर्ण दक्षिणापथ अपितु
कावेरी तक का दक्षिणी भारत और विंध्याचल के उत्तर के भी
कतिपय प्रदेश उसकी अधीनता में आ गए थे। सिंघण न केवल अनुपम विजेता था, अपितु साथ ही विद्वानों का आश्रयदाता और विद्याप्रेमी भी था। 'संगीतरत्नाकर' का रचयिता सारंगधर (सारंगदेव) उसी के
आश्रय में रहता था। प्रसिद्ध ज्योतिषी चांगदेव भी उसकी राजसभा का एक उज्ज्वल रत्न था। भास्कराचार्य द्वारा रचित 'सिद्धांतशिरोमणि' तथा ज्योतिष सम्बन्धी अन्य ग्रंथों
के अध्ययन के लिए उसने एक शिक्षाकेन्द्र की स्थापना भी की थी।
सिंघण के उत्तराधिकारी
सिंघण के बाद उसके पोते 'कृष्ण'
(1247-1260) ने और फिर कृष्ण के भाई 'महादेव'
(1260-1271) ने देवगिरि के राजसिंहासन को सुशोभित किया। इन राजाओं
के समय में भी गुजरात और शिलाहार
राज्य के साथ यादवों के युद्ध जारी रहे। महादेव के बाद 'रामचन्द्र'
(1271-1309) यादवों का राजा बना। उसके समय में 1294 ई. में दिल्ली के प्रसिद्ध अफ़ग़ान विजेता अलाउद्दीन ख़िलजी ने दक्षिणी भारत
में विजय यात्रा की। इस समय देवगिरि का यादव राज्य दक्षिणापथ की प्रधान शक्ति था।
अतः स्वाभाविक रूप से अलाउद्दीन ख़िलज़ी का मुख्य संघर्ष यादव राजा रामचन्द्र के
साथ ही हुआ। अलाउद्दीन जानता था कि सम्मुख युद्ध में रामचन्द्र को परास्त कर सकना
सुगम नहीं है। अतः उसने छल का प्रयोग किया और यादव राज के प्रति मैत्रीभाव
प्रदर्शित कर उसका आतिथ्य ग्रहण किया। इस प्रकार जब रामचन्द्र असावधान हो गया तो
अलाउद्दीन ने उस पर अचानक हमला कर दिया। इस स्थिति में यादवों के लिए अपनी
स्वतंत्रता को क़ायम रखना असम्भव हो गया और रामचन्द्र ने विवश होकर अलाउद्दीन
ख़िलज़ी के साथ सन्धि कर ली।
अलाउद्दीन द्वारा रामचन्द्र का स्वागत
इस सन्धि के परिणामस्वरूप जो अपार सम्पत्ति अफ़ग़ान
विजेता ने प्राप्त की, उसमें 600 मन मोती,
200 मन रत्न, 1000 मन चाँदी, 4000 रेशमी वस्त्र
और उसी प्रकार के अन्य बहुमूल्य उपहार सम्मिलित थे। इसके अतिरिक्त रामचन्द्र ने
अलाउद्दीन ख़िलज़ी को वार्षिक कर भी देना स्वीकृत किया। यद्यपि रामचन्द्र परास्त
हो गया था, फिर भी उसमें अभी स्वतंत्रता की भावना अवशिष्ट
थी। उसने ख़िलज़ी के आधिपत्य का जुआ उतार फैंकने के विचार से वार्षिक कर देना बन्द
कर दिया। इस पर अलाउद्दीन ने अपने सेनापति मलिक काफ़ूर को उस पर आक्रमण
करने के लिए भेजा। काफ़ूर का सामना करने में रामचन्द्र असमर्थ रहा और उसे
गिरफ़्तार करके दिल्ली भेज दिया गया।
वहाँ पर ख़िलज़ी सुल्तान ने उसका स्वागत किया और उसे 'रायरायाओ'
की उपाधि से विभूषित किया। अलाउद्दीन रामचन्द्र की शक्ति से
भली-भाँति परिचित था और इसीलिए उसे अपना अधीनस्थ राजा बनाकर ही संतुष्ट हो गया। पर
यादवों में अपनी स्वतंत्रता की भावना अभी तक भी विद्यमान थी।
अंत
रामचन्द्र के बाद उसके पुत्र 'शंकर' ने अलाउद्दीन ख़िलज़ी के विरुद्ध विद्रोह
किया। एक बार फिर मलिक काफ़ूर देवगिरि पर आक्रमण करने
के लिए गया और उससे लड़ते-लड़ते शंकर ने 1312 ई. में वीरगति
प्राप्त की। 1316 में जब अलाउद्दीन की मृत्यु हुई तो
रामचन्द्र के जामाता 'हरपाल' के
नेतृत्व में यादवों ने एक बार फिर स्वतंत्र होने का प्रयत्न किया, पर उन्हें सफलता नहीं मिली। हरपाल को गिरफ़्तार कर लिया गया और अपना रोष
प्रकट करने के लिए सुल्तान मुबारक ख़ाँ ने उसकी जीते-जी उसकी ख़ाल खिंचवा दी। इस
प्रकार देवगिरि के यादव वंश की सत्ता का अन्त हुआ और उनका प्रदेश दिल्ली के अफ़ग़ान साम्राज्य के
अंतर्गत आ गया।
देवगिरि के यादव शासक
कल्याणी के पश्चिमी चालुक्यों के अधीनस्थ सामंत-
द्रिधाप्रहर
सयूनचंद्र 850–874 C.E.
धदियाप्पा 874–900 C.E.
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भिल्लम प्रथम 900–925
C.E.
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वदुगी (वाद्दीगा) 950–974 C.E.
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धदियाप्पा द्वितीय 974–975 C.E.
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Bhillama II 975–1005
C.E., helped Western Chalukya king Tailapa II in battle against Paramara king Munja.
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Vesugi I 1005–1020 C.E.
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Bhillama III 1020–1055
C.E., ruled near Sinnar, Nasik. Helped Chalukya Somesvara against Paramaras
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Vesugi II 1055–1068 C.E.
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Bhillama III 1068 C.E.
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Seunachandra II
1068–1085 C.E., overcame civil war, defeated Bhillama IV to become king.
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Airamadeva 1085–1115
C.E.
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Singhana I 1115–1145
C.E.
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Mallugi I 1145–1150
C.E., beginning period of internal family feud which lasted until 1173
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Amaragangeyya 1150–1160
C.E.
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Govindaraja 1160 C.E.
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Amara Mallugi II
1160–1165 C.E.
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Kaliya Ballala 1165–1173
C.E.
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Bhillama V 1173–1192
C.E.
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Jaitugi I 1192–1200 C.E.
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Singhana II 1200–1247
C.E.
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Kannara 1247–1261 C.E.
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Mahadeva 1261–1271 C.E.
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Amana 1271 C.E.
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Ramachandra 1271–1311
C.E.
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Singhana III (Shankaradeva)1311C.E.
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Harapaladeva 1311–1317
C.E.
देवगिरि
दौलताबाद क़िला- एक उपेक्षित क़िला। इतिहास गवाह है- यही एक मात्र एक ऐसा क़िला है जिसे कभी कोई जीत नहीं सका। कई राजाओं की तरह महान अकबर ने भी इस पर चार बार चढाई की थी मगर सफल नहीं हुआ। इस के अविजित होने में इस की सरंचना को श्रेय जाता है। यह क़िला महाराष्ट्र राज्य में औरंगाबाद से 13 किलोमीटर पर पहाडी की चोटी पर स्थित है.।
देवगिरी औरंगाबाद ज़िला, महाराष्ट्र राज्य, दक्षिण-पश्चिम भारत में स्थित
प्रख्यात नगर है। यह प्राचीन समय में यादवों की राजधानी थी। देवगिरि आधुनिक दौलताबाद का प्राचीन नाम
है। इसकी स्थापना यादव वंश के राजा भिल्लम
द्वारा की गई थी। बाद के समय मुस्लिम आक्रमणकारियों
का देवगिरि पर हमला हुआ। पहले इस पर ख़िलजी सुल्तान अलाउद्दीन ख़िलजी ने फिर मुहम्मद बिन तुग़लक़ ने अधिकार किया।
मुहम्मद तुग़लक ने देवगिरि को जीतकर अपनी राजधानी बनाया और इसका नाम बदलकर 'दौलताबाद' रख दिया था। मुग़ल बादशाह अकबर के समय में
देवगिरि को मुग़लों ने जीत लिया और इसे मुग़ल साम्राज्य में शामिल कर
लिया गया। मुग़लों का यह अधिकार बादशाह औरंगज़ेब के राज्य काल तक
बना रहा।
इतिहास
जैन पंडित हेमाद्रि के कथनानुसार देवगिरि की स्थापना यादव नरेश भिलम्म (प्रथम)
ने की थी। यादव नरेश पहले चालुक्य राज्य के अधीन थे।
भिलम्म ने 1187 ई. में स्वतंत्र राज्य स्थापित करके देवगिरि
में अपनी राजधानी बनाई। उसके पौत्र सिंहन या सिंघण ने प्राय: संपूर्ण पश्चिमी
चालुक्य राज्य अपने अधिकार में कर लिया। देवगिरि के क़िले पर अलाउद्दीन ख़िलजी ने
पहली बार 1294 ई. में चढ़ाई की थी। पहले तो यादव नरेश ने
उसका कारद होना स्वीकार कर लिया, किन्तु पीछे से उन्होंने दिल्ली के सुल्तान को
खिराज देना बन्द कर दिया, जिसके फलस्वरूप 1307, 1310 और 1318 ई. में मलिक काफ़ूर ने फिर देवगिरि
पर आक्रमण किया।
नाम परिवर्तन
यहाँ का अंतिम राजा हरपाल सिंह युद्ध में पराजित हुआ और
क्रूर सुल्तान की आज्ञा से उसकी खाल खिंचवा ली गई। 1338 ई. में मुहम्मद
तुग़लक ने देवगिरि को अपनी राजधानी बनाने का निश्चय किया, क्योंकि
मुहम्मद तुग़लक के विशाल साम्राज्य की देखरेख दिल्ली की अपेक्षा देवगिरि से अधिक
अच्छी तरह की जा सकती थी। सुल्तान ने दिल्ली की प्रजा को देवगिरि जाने के लिए
बलात् विवश किया। 17 वर्ष पश्चात् देवगिरि के लोगों को असीम
कष्ट भोगते देखकर इस उतावले सुल्तान ने फिर उन्हें दिल्ली वापस आ जाने का आदेश
दिया। सैकड़ों मील की यात्रा के पश्चात् दिल्ली के निवासी किसी प्रकार फिर अपने घर
पहुँचे। मुहम्मद तुग़लक ने देवगिरि का नाम बदलकर दौलताबाद रखा और वारंगल के राजाओं के
विरुद्ध युद्ध करने के लिए इस स्थान को अपना आधार बनाया था। किन्तु उत्तर भारत में गड़बड़
प्रारम्भ हो जाने के कारण वह अधिक समय तक राजधानी देवगिरि में नहीं रख सका।
निज़ाम आसफ़शाह का अधिकार
मुहम्मद तुग़लक के राज्य काल में प्रसिद्ध अफ्रीकी यात्री इब्नबतूता दौलताबाद आया
था। उसने इस नगर की समृद्धि का वर्णन करते हुए उसे दिल्ली के समकक्ष ही
बताया है। राजधानी के दिल्ली वापस आ जाने के कुछ ही समय पश्चात् गुलबर्गा के सूबेदार जफ़र ख़ाँने दौलताबाद पर क़ब्ज़ा कर लिया और
यह नगर इस प्रकार बहमनी सुल्तानों के
हाथों में आ गया। यह स्थिति 1526 तक रही। अब इस नगर पर निज़ामशाही सुल्तानों का
अधिकार हो गया। तत्पश्चात् मुग़ल सम्राट अकबर का अहमदनगर पर क़ब्ज़ा हो
जाने पर दौलताबाद भी मुग़ल साम्राज्य में सम्मिलित हो
गया। किन्तु पुन: इसे शीघ्र ही अहमदनगर के सुल्तानों ने वापस ले लिया। 1633
ई. में शाहजहाँ के सेनापति ने
दौलताबाद पर क़ब्ज़ा कर लिया और तब से औरंगज़ेब के राज्य काल के
अंत तक यह ऐतिहासिक नगर मुग़लों के हाथ में ही रहा। औरंगज़ेब की मृत्यु के कुछ समय
पश्चात् मुहम्मदशाह के शासन काल में हैदराबाद के प्रथम निज़ाम
आसफ़शाह ने दौलताबाद को अपनी नई रियासत में शामिल कर लिया।
दुर्ग का स्थापत्य
देवगिरि का यादव कालीन दुर्ग एक त्रिकोण पहाड़ी पर स्थित
है। क़िले की ऊँचाई, आधार से 150 फुट है।
पहाड़ी समुद्र तल से 2250 फुट ऊँची है। क़िले की बाहरी दीवार
का घेरा 2¾ मील है और इस दीवार तथा क़िले के आधार के बीच
क़िलाबेदियों की तीन पंक्तियां हैं। प्राचीन देवगिरि नगरी इसी परकोटे के भीतर बसी
हुई थी। किन्तु उसके स्थान पर अब केवल एक गांव नजर आता है। क़िले के कुल आठ फाटक
हैं। दीवारों पर कहीं-कहीं आज भी पुरानी तोपों के अवशेष पड़े हुए हैं।
इस दुर्ग में एक अंधेरा भूमिगत मार्ग भी है, जिसे 'अंधेरी' कहते हैं। इस मार्ग में कहीं-कहीं पर गहरे
गढ़डे भी हैं, जो शत्रु को धोखे से गहरी खाई में गिराने के
लिए बनाये गये थे। मार्ग के प्रवेश द्वार पर लोहे की बड़ी अंगीठियाँ बनी हैं,
जिनमें आक्रमणकारियों को बाहर ही रोकने के लिए आग सुलगा कर धुआं किया जाता था। क़िले की पहाड़ी में कुछ अपूर्ण गुफ़ाएं भी
हैं, जो एलोरा की गुफ़ाओं के
समकालीन हैं।
Good information.write other references.
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