मध्यप्रदेश
भारत की संस्कृति में मध्यप्रदेश जगमगाते दीपक के समान है, जिसकी रोशनी की सर्वथा अलग प्रभा और प्रभाव है। यह विभिन्न संस्कृतियों की अनेकता में एकता का जैसे आकर्षक गुलदस्ता है, मध्यप्रदेश, जिसे प्रकृति ने राष्ट्र की वेदी पर जैसे अपने हाथों से सजाकर रख दिया है, जिसका सतरंगी सौन्दर्य और मनमोहक सुगन्ध चारों ओर फैल रहे हैं। यहाँ के जनपदों की आबोहवा में कला, साहित्य और संस्कृति की मधुमयी सुवास तैरती रहती है। यहाँ के लोक समूहों और जनजाति समूहों में प्रतिदिन नृत्य, संगीत, गीत की रसधारा सहज रुप से फूटती रहती है। यहाँ का हर दिन पर्व की तरह आता है और जीवन में आनन्द रस घोलकर स्मृति के रुप में चला जाता है। इस प्रदेश के तुंग-उतुंग शैल शिखर विन्ध्य-सतपुड़ा, मैकल-कैमूर की उपत्यिकाओं के अन्तर से गूँजते अनेक पौराणिक आख्यान और नर्मदा, सोन, सिन्ध, चम्बल, बेतवा, केन, धसान,तवा नदी, ताप्ती आदि सर-सरिताओं के उद्गम और मिलन की मिथकथाओं से फूटती सहस्त्र धाराएँ यहाँ के जीवन को आप्लावित ही नहीं करतीं, बल्कि परितृप्त भी करती हैं।
संस्कृति संगम
मध्यप्रदेश में पाँच लोक संस्कृतियों का समावेशी संसार है। ये पाँच साँस्कृतिक क्षेत्र है-
- निमाड़
- मालवा
- बुन्देलखण्ड
- बघेलखण्ड
- ग्वालियर (चंबल)
प्रत्येक सांस्कृतिक क्षेत्र या भू-भाग का एक अलग जीवंत लोकजीवन, साहित्य, संस्कृति, इतिहास, कला, बोली और परिवेश है। मध्यप्रदेश लोक-संस्कृति के मर्मज्ञ विद्वान श्री वसन्त निरगुणे लिखते हैं- "संस्कृति किसी एक अकेले का दाय नहीं होती, उसमें पूरे समूह का सक्रीय सामूहिक दायित्व होता है। सांस्कृतिक अंचल (या क्षेत्र) की इयत्त्ता इसी भाव भूमि पर खड़ी होती है। जीवन शैली, कला, साहित्य और वाचिक परम्परा मिलकर किसी अंचल की सांस्कृतिक पहचान बनाती है।"
मध्यप्रदेश की संस्कृति विविधवर्णी है। गुजरात, महाराष्ट्र अथवा उड़ीसा की तरह इस प्रदेश को किसी भाषाई संस्कृति में नहीं पहचाना जाता। मध्यप्रदेश विभिन्न लोक और जनजातीय संस्कृतियों का समागम है। यहाँ कोई एक लोक संस्कृति नहीं है। यहाँ एक तरफ़ पाँच लोक संस्कृतियों का समावेशी संसार है, तो दूसरी ओर अनेक जनजातियों की आदिम संस्कृति का विस्तृत फलक पसरा है।
इतिहास
आदि काल से ही मध्यप्रदेश का क्षेत्र यदुवंशियों की कर्म भूमि रही रही है | अवन्ती प्रदेश एवं चेदि प्रदेश पर आरंभिक समय से ही यादवों का शासन रहा है | पौराणिक वृतान्तातों के अनुसार चंद्रवंशी राजा ययाति अपने सबसे छोटे बेटे पुरू को अधिक चाहता था और उसी को उसने राज्य देने का विचार प्रकट किया । परन्तु राजा के सभासदों ने ज्येष्ठ पुत्र के रहते हुए इस कार्य का विरोध किया (महाभारत, 1,85,32) । यदु ने पुरू पक्ष का समर्थन किया और स्वयं राज्य लेने से इंकार कर दिया । इस पर पुरू को राजा घोषित किया गया और वह प्रतिष्ठान की मुख्य शाखा का शासक हुआ । उसके वंशज पौरव कहलाये । ज्येष्ठ भ्राता यदु को चर्मरावती अथवा चर्मण्वती ( चंबल ), बेत्रवती ( बेतवा ) और शुक्तिमती ( केन ) का तटवर्ती प्रदेश मिला। यह क्षेत्र आधुनिक मध्यप्रदेश में आता है | कालांतर में महाराजा यदु के ज्येष्ठ पुत्र सहस्त्रजित के वंशज हैहय ने अवन्ती राज्य की स्थापना की |
मालवा (अवन्ती राज्य)
पुराणों के अनुसार अवंती राज्य की स्थापना हैहय कुल के यदुवंशी क्षत्रियों द्वारा की गई थी। कार्तवीर्य अर्जुन इस वंश का सबसे प्रतापी राजा था, जिसे सहस्त्रबाहु भी कहा जाता था | कार्तवीर्य अर्जुन रावण का समकालीन था | इनके वंशज तालजंघ एवं वीतिहोत्र यादव के नाम से विख्यात हुए | भगवान श्री कृष्ण का मौसी का घर भी उज्जैन में ही था | प्राचीन अवन्ती राज्य को ही मालवा प्रदेश के नाम से जाना जाता था | जिसकी राजधानी उज्जयिनी और महिष्मति थी। उज्जयिनी (उज्जैन) मध्य प्रदेश राज्य का एक प्रमुख शहर है। जैन ग्रंथ भगवती सूत्र में इसी जनपद को मालव कहा गया है। इस जनपद में स्थूल रूप से वर्तमान मालवा, निमाड़ और मध्य प्रदेश का बीच का भाग सम्मिलित था। विष्णु पुराण* से विदित होता है कि संभवत: गुप्त काल से पूर्व अवन्ती पर आभीरों का आधिपत्य था | अवन्ती महाजनपद का उल्लेख बौद्ध ग्रन्थ अंगुत्तर निकाय, महावस्तु एवं जैन ग्रंथों मे वर्णित 16 महाजनपदों में तथा ईसा पूर्व छठी सदी में वैयाकरण पाणिनी द्वारा वर्णित 22 महाजनपदों में है |
जैन ग्रन्थ विविधतीर्थ कल्प में मालवा प्रदेश का ही नाम अवंति या अवंती है। महाकाल की शिव के द्वादश ज्योतिर्लिगों में गणना की जाती है। इसी कारण इस नगरी को शिवपुरी भी कहा गया है। प्राचीन अवंती वर्तमान उज्जैन के स्थान पर ही बसी थी, यह तथ्य इस बात से सिद्ध होता है कि क्षिप्रा नदी जो आजकल भी उज्जैन के निकट बहती है, प्राचीन साहित्य में भी अवंती के निकट ही वर्णित है। मालवा कुरुबा जाति में उत्पन्न महाकवि कालीदास की धरती है। यहाँ की धरती हरी-भरी, धन-धान्य से भरपूर रही है। यहाँ के लोगों ने कभी भी अकाल को नहीं देखा। विन्ध्याचल के पठार पर प्रसरित मालवा की भूमि सस्य, श्यामल, सुन्दर और उर्वर तो है ही, यहाँ की धरती पश्चिम भारतकी सबसे अधिक स्वर्णमयी और गौरवमयी भूमि रही है।
इस क्षेत्र में चेदि वंश एवं हैहय वंश के अतिरिक्त यादवों के करुष, दसार्ण एवं निषध वंश ने भी शासन किया था | 8 वीं सदी से 10 वीं सदी के मध्य मालवा पर यदुवंशी सात्यिकी के वंशज राष्ट्रकूट वंश का शासन रहा |
बुंदेलखंड
बुदेलखंड के प्राचीन इतिहास के संबंध में सर्वाधिक महत्वपूर्ण धारणा यह है कि यह चेदि जनपद का हिस्सा था। कुछ विद्वान चेदि जनपद को ही प्राचीन बुंदेलखंड मानते हैं। पौराणिक काल में बुंदेलखंड प्रसिद्ध शासकों के अधीन रहा है जिनमें यदुवंशी राजाओं के शृंखलाबद्ध शासनकाल का उल्लेख सबसे अधिक है।
चेदि आर्यों का एक अति प्राचीन वंश है। ऋग्वेद की एक दानस्तुति में इनके एक अत्यंत शक्तिशाली नरेश कशु का उल्लेख है। ऋग्वेदकाल में ये संभवत: यमुना और विंध्य के बीच बसे हुए थे। पुराणों में वर्णित परंपरागत इतिहास के अनुसार यादवों के नरेश विदर्भ के तीन पुत्रों में से द्वितीय कैशिक चेदि का राजा हुआ और उसने चेदि शाखा का स्थापना की। महाभारत काल में यदुवंशी राजा दमघोष का पुत्र शिशुपाल चेदि राज्य का राजा था, जो रिश्ते में श्री कृष्ण का फुफेरा बही था | महाभारत के युद्ध में चेदि पांडवों के पक्ष में लड़े थे। चेदि राज्य आधुनिक बुंदेलखंड में स्थित रहा होगा और यमुना के दक्षिण में चंबल और केन नदियों के बीच में फैला रहा होगा। छठी शताब्दी ईसा पूर्व के 16 महाजनपदों की तालिका में चेति अथवा चेदि का भी नाम आता है। चेदि लोगों के दो स्थानों पर बसने के प्रमाण मिलते हैं - नेपाल में और बुंदेलखंड में। इनमें से दूसरा इतिहास में अधिक प्रसिद्ध हुआ। मुद्राराक्षस में मलयकेतु की सेना में खश, मगध, यवन, शक हूण के साथ चेदि लोगों का भी नाम है।
चेदी प्राचीन भारत के 16 महाजनपदों में से एक था। इसका शासन क्षेत्र मध्य तथा पश्चिमी भारत था। आधुनिक बुंदलखंड तथा उसके समीपवर्ती भूभाग तथा मेरठ इसके आधीन थे। शक्तिमती या संथिवती इसकी राजधानी थी।
845 ई. से लगभग 1070 ई. तक बुंदेलखंड पर कलचुरी वंश ने शासन किया | इस वंश की स्थापना कोक्कल प्रथम ने 845 ई. में की थी | जेजाकभुक्ति के चंदेलों के राज्य के दक्षिण में कलचुरि राजवंश का राज्य था जिसे चेदी राजवंश भी कहते हैं। कलचुरि अपने को कार्तवीर्य अर्जुन का वंशज बतलाते थे और इस प्रकार वे पौराणिक अनुवृत्तों की हैहय जाति की शाखा थे। इनकी राजधानी त्रिपुरी जबलपुर के पास स्थित थी और इनका उल्लेख डाहल-मंडल के नरेशों के रूप में आता है। बुंदेलखंड के दक्षिण का यह प्रदेश 'चेदि देश' के नाम से प्रसिद्ध था इसीलिए इनके राजवंश को कभी-कभी चेदि वंश भी कहा गया है।
कलचुरी वंश बुंदेलखंड का एक महत्वपूर्ण शासक रहा है। उनके शासनकाल के दौरान बुंदेलखंड में कई युद्ध हुए और निरंतर अनिश्चय का वातावरण रहा। कलचुरी वंश लगभग तीन सौ वर्ष तक दक्षिणी बुंदेलखंड का शासक रहा। बारहवीं शताब्दी में चंदेल शासकों की बढ़ती शक्ति के कारण कलचुरियों का पराभव हुआ। कलचुरी शैवोपासक थे इसलिए उनके बनवाए मदिरों में शिव मंदिर अधिक हैं। उनमें त्रिदेवों की पूजा भी होती थी। स्थापत्य और मूर्तिकला को कलचुरियों ने काफी प्रोत्साहन दिया। ऐसी भी धारणा है कि समाज में विभिन्न वर्गों में उपजातियों का निर्माण इसी काल में हुआ था।
बुन्देलखण्ड मध्य भारत का एक प्राचीन क्षेत्र है। इसका विस्तार मध्य प्रदेश तथा उत्तर प्रदेश में भी है। बुंदेली इस क्षेत्र की मुख्य बोली है। इसमें उत्तरप्रदेश के जालौन, झांसी, ललितपुर, हमीरपुर, बाँदा और महोबा तथा मध्यप्रदेश के सागर, दमोह, टीकमगढ़, छतरपुर, पन्ना, दतिया के अलावा भिंड जिले की लहार और ग्वालियर जिले की मांडेर तहसीलें तथा रायसेन और विदिशा जिले का कुछ भाग भी शामिल है।
बुंदेली माटी में जन्मी अनेक विभूतियों ने न केवल अपना बल्कि इस अंचल का नाम खूब रोशन किया और इतिहास में अमर हो गए। इसमें आल्हा-ऊदल प्रमुख है | आल्हा और ऊदल दो भाई थे जो अहीर जाति से आते थे । ये बुन्देलखण्ड (महोबा) के वीर योद्धा थे। इनकी वीरता की कहानी आज भी उत्तर-भारत के गाँव-गाँव में गायी जाती है। जगनिक ने आल्ह-खण्ड नामक एक काव्य रचा था उसमें इन वीरों की गाथा वर्णित है।
पं० ललिता प्रसाद मिश्र ने अपने ग्रन्थ आल्हखण्ड की भूमिका में आल्हा को युधिष्ठिर और ऊदल को भीम का साक्षात अवतार बताते हुए लिखा है - "यह दोनों वीर अवतारी होने के कारण अतुल पराक्रमी थे। ये प्राय: 12वीं विक्रमीय शताब्दी में पैदा हुए और 13वीं शताब्दी के पुर्वार्द्ध तक अमानुषी पराक्रम दिखाते हुए वीरगति को प्राप्त हो गये। वह शताब्दी वीरों की सदी कही जा सकती है और उस समय की अलौकिक वीरगाथाओं को तब से गाते हम लोग चले आते हैं। आज भी कायर तक उन्हें (आल्हा) सुनकर जोश में भर अनेकों साहस के काम कर डालते हैं। योरोपीय महायुद्ध में सैनिकों को रणमत्त करने के लिये ब्रिटिश गवर्नमेण्ट को भी इस (आल्हखण्ड) का सहारा लेना पड़ा था।"
होल्कर वंश भारत में इन्दौर के मराठा शासक रहे हैं। इन्हें मूलरूप से एक चरवाहा जाति (यादव / कुरुबा) या कृषक वंश के रूप में जाना जाता है, जो मथुरा ज़िले से आकर दक्कन के गाँव ‘होल’ या ‘हल’ में बस गये थे। इसी गाँव के निवासी होने के कारण इनका पारिवारिक नाम 'होल्कर' हो गया। इस राजवंश के संस्थापक मल्हारराव होल्कर अपनी योग्यता के बलबूते पर किसान मूल से ऊपर उठे थे। मल्हारराव की मृत्यु के पश्चात उनकी पुत्रवधु अहिल्याबाई होल्कर ने राजपाट अपने हाथों में ले लिया और बड़ी ही कुशलता के साथ उसका संचालन किया।
1724 ई. में मराठा राज्य के पेशवा (प्रधानमंत्री) बाजीराव प्रथम ने मल्हारराव होल्कर को 500 घुड़सवार सैनिकों की कमान सौंपी और जल्दी ही वह मालवा में पेशवा के प्रधान सेनापति बन गये, जिसका मुख्यालय 'महेश्वर' व 'इन्दौर' में था। 1766 ई. में मृत्यु होने तक मल्हारराव मालवा के वास्तविक शासक थे। 1767 से 1794 ई. तक उनके पुत्र खाण्डेराव की विधवा अहिल्याबाई होल्कर ने बहुत कुशलता और योग्यतापूर्वक राज्य का शासन चलाया। हिंसा के सागर में इन्दौर समृद्धि तथा शान्ति का सागर था और अहिल्याबाई के शासन, न्याय व बुद्धि के लिए विख्यात था। उन्होंने अनेक मंदिरों का पुनरुद्धार करवाया, जिसमे द्वारिका (गुजरात) का श्री कृष्ण मंदिर तथा गंगा किनरे अवस्थित काशी-विश्वनाथ मंदिर प्रमुख है | उन्होंने अपने दूर के सम्बन्धी तुकोजी होल्कर को अपना सेनापति नियुक्त किया था, जो दो वर्ष बाद अहिल्याबाई होल्कर की मृत्यु होने पर उनके उत्तराधिकारी बने। 1797 ई. में तुकोजी होल्कर के नाजायज़ बेटे जसवन्तराव ने सत्ता पर क़ब्ज़ा कर लिया । अंग्रेजी राज में इन्हें 19 बन्दुक की सलामी की पदवी मिली हुई थी | 'होल्कर वंश' का शासन 1947 ई. में देश के आज़ाद होने और राज्य के अलग अस्तित्व की समाप्ति तक चलता रहा।
- अहिल्याबाई होलकर की प्रतिमा
संत सिंगाजी महराज - संत सिंगाजी का जन्म सम्वत् 1563 में मिति वैषाख सुदी नवमी-बुधवार को पुष्य नक्षत्र में प्रातः 6 बजे दिन को बठवानी स्टेट मध्यप्रदेश के खजूरी ग्राम में हुआ था। संत श्री सिंगाजी महाराज के पिता का नाम भीमजी था तथा माता का नाम गऊरबाई था। संत सिंगाजी की पत्नी का नाम जसौदाबाई था। संत सिंगाजी के चार पुत्र थे जिनके नाम कालु, भोलु, सहू तथा दीपू थे। जब सिंगाजी 5 वर्ष के थे तब उनके पिता आर्थिक कठिनाइयों के कारण खजूरी छोड़कर खण्डवा जिले की हरसूद नगरी में पशुपालन की ट्टष्टि लेकर आये थे। हरसूद नगर में संत सिंगाजी का बचपन व्यतीत हुआ था, युवावस्था तक उन्होंने पशुपालन का ही व्यवसाय किया। युवावस्था में भामगढ़ तक डाक ले जाने का काम किया करते थे। राजा ने सिंगाजी महाराज की कार्यकुशलता, वफादारी व ईमानदारी से प्रभावित होकर वेतन 3 रुपया 50 पैसे माहवार तक कर दिया था। सिंगाजी केवल डाकिया ही नहीं वरन् राजा के सरदार भी थे |सतं सिंगाजी बचपन से ही सांसारिक प्रपंचों के प्रति उदासीन रहा करते थे। ईश्वर के प्रति अगाध प्रेम था। मन निर्मल था तभी तो संत श्री ब्रहागिरी बाबा के भजन की एक ही पंक्ति ने एक साधारण गवली पुत्र को युग-युगान्तर का महान संत सिंगाजी बाबा बना दिया।
मध्यप्रदेश के प्रमुख यदुवंशी –
- स्व० पन्ना लाल यादव – प्रखर स्वतंत्रता सेनानी
- श्री बाबूलाल गौर – मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री, वर्तमान में मध्यप्रदेश के गृह मंत्री एवं गोविन्दपुरा सीट से भाजपा के विधायक
- स्व० सुभाष यादव – पूर्व उप मुख्यमंत्री एवं कांग्रेसी नेता
- अरुण यादव – स्व० सुभाष यादव के पुत्र एवं खंडवा से कांग्रेस के सांसद, पूर्व केन्द्रीय मंत्री
- श्रीमती कृष्णा गौर – भोपाल की मेयर एवं बाबूलाल गौर के पुत्रवधू
- अखंड प्रताप सिंह – मध्यप्रदेश के 1996 के कांग्रेस सरकार एवं 2007 की भाजपा सरकार में कैबिनेट मंत्री, टीकमगढ़ से तीन बार विधायक, स्व० पन्ना लाल यादव के पुत्र, भाजपा नेता
- अभय प्रताप सिंह – मध्यप्रदेश युवा यादव महासभा के अध्यक्ष, श्री अखंड प्रताप सिंह के पुत्र एवं स्व० पन्ना लाल जी के सुपौत्र, भाजपा नेता
- यादवेन्द्र सिंह – विधायक, नागोद, कांग्रेस, इसके पूर्व वे टीकमगढ़ से विधायक थे |
- लखन सिंह यादव – विधायक, भितरवार, कांग्रेस
- हर्ष यादव – विधायक, देवरी, कांग्रेस
- सचिन सुभाष चन्द्र यादव- विधायक, कसरवाद, कांग्रेस
- राम सिंह यादव – विधायक, कोलारस, कांग्रेस
- ललिता यादव – विधायक, छतरपुर, बीजेपी
- राजेश यादव धर्म वीर सिंह- विधायक, गरोठ, बीजेपी
- अहीर रेखा यादव- विधायक, मल्हार, बीजेपी
- अमर सिंह यादव – विधायक, राजगढ़, बीजेपी
- मोहन यादव – विधायक, उज्जैन दक्षिण, बीजेपी
- मीरा दीपक यादव – पूर्व विधायक, निवारी
- अजय यादव – पूर्व विधायक, खड़गपुर
- राव देशराज सिंह यादव – पूर्व विधायक, मुन्ग्वाली
- भरत यादव – आई ए एस अधिकारी
- अजय सिंह यादव - आई ए एस अधिकारी
- बिनोद सिंह बघेल - आई ए एस अधिकारी
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