गुरुवार, 7 अगस्त 2014

Yadav king Poras or Puru - यादव राजा पोरस

राजा पोरस :-

शासन काल :- 340 – 317 ई० पू०
शासन क्षेत्र – आधुनिक पंजाब एवं पाकिस्तान में झेलम नदी से चिनाब नदी तक |
उतराधिकारी :- मलयकेतु (पोरस के भाई का पोता )
वंश – शूरसेनी (यदुवंशी)

चित्र:Indian war elephant against Alexander’s troops 1685.jpg
    
     सिन्धु नरेश पोरस का शासन कल 340 ई० पू० से 317 ई० पू० तक माना जाता है | इनका शासन क्षेत्र आधुनिक पंजाब में झेलम नदी और चिनाव नदी (ग्रीक में ह्यिदस्प्स और असिस्नस) के बीच अवस्थित था | उपनिवेश ब्यास नदी (ह्यीपसिस) तक फैला हुआ था | उसकी राजधानी आज के वर्तमान शहर लाहौर के पास थी महाराजा पोरस सिंध-पंजाब सहित एक बहुत बड़े भू-भाग के स्वामी थे। उनकी कद – काठी विशाल थी | माना जाता है की उनकी लम्बाई लगभग 7.5 फीट थी |
प्रसिद्ध इतिहासकार ईश्वरी प्रसाद एवं अन्य का मानना है कि पोरस शूरसेनी था| प्रसिद्ध यात्री मेगास्थनीज का भी मत था कि पोरस मथुरा के शूरसेन वंश का था, जो अपने को यदुवंशी श्री कृष्ण का वंशज मानता था| मेगास्थनीज के अनुसार उनके राज ध्वज में श्री कृष्ण विराजमान रहते थे तथा वहां के निवासी श्री कृष्ण की पूजा किया करते थे | टॉड तथा अन्य इतिहासकारों का कहना है की श्री कृष्ण की मृत्यु के बाद शूरसेन वंश के कुछ लोगों ने मथुरा एवं द्वारिका से पश्चिम की दिशा में विस्थापित होकर आधुनिक पंजाब एवं आफगानिस्तान के पास एक नए साम्राज्य की स्थापना किया | इसी साम्राज्य का सबसे प्रतापी राजा पोरस हुआ |
बात 326 ईसा पूर्व की है, जब मेसिडोनिया का शासक सिकंदर विश्व विजेता बनने के लिए निकल पड़ा था। सेना सहित उसने भारत की की सीमा पर डेरा डाल लिया था। परंतु भारत पर कब्ज़ा करने से पहले उसे सिंध के महाराज पोरस से युद्ध करना ज़रूरी था। पोरस की वीरता के किस्से वह पहले ही सुन चुका था। पोरस की विशाल सेना और मदमाते हाथियों से भिड़ना, उसकी सेना के लिए कठिन था। इसलिए उसने महाराजा पोरस से दुश्मनी की जगह दोस्ती का हाथ बढ़ाना ही उचित समझा। वह महाराजा से संधि ही करना चाहता था।
सिंध को पार किए बगैर भारत में पैर रखना मुश्किल था। महाराजा पोरस सिंध-पंजाब सहित एक बहुत बड़े भू-भाग के स्वामी थे। अब संधि का प्रस्ताव लेकर महाराज पोरस के पास कौन जाए? सिकंदर को इस बात की बड़ी उलझन थी। एक दिन वह स्वयं दूत का भेष धारण कर महाराजा पोरस के दरबार पहुंच गया। महाराजा पोरस में देशप्रेम की भावना कूट-कूट कर भरी थी। इसके साथ-साथ वह इंसान की परख भी बखूबी कर लेते थे। उनकी तेज़ नज़रें, दूत भेष में आए सिकंदर को पहचान गईं। किंतु वह चुप रहे। उन्होंने दूत को पूरा सम्मान दिया। दूत भेषधारी सिकंदर ने अपने सम्राट का आदेश सुनाते हुए कहा, ‘सम्राट सिकंदर विश्व विजय के लिए निकले हैं और राजा-महाराजाओं के सिर पर पैर रखकर चल सकने में समर्थ हैं, वह सम्राट सिकंदर आपसे मित्रता करना चाहते हैं।
यह सुनकर पोरस मुस्कुराए और बोले, ‘राजदूत, हम पहले देश के पहरेदार हैं, बाद में किसी के मित्र। और फिर देश के दुश्मनों से मित्रता..!! दुश्मनों से तो रणभूमि में तलवारें लड़ाना ही पसंद करते हैं।दरबार में बतचीत का सिलसिला ज़ारी ही था, तभी रसोइए ने भोजन के लिए आकर कहा।
दूत को साथ लेकर महाराज पोरस भोजनालय पहुंच गए। भोजन कक्ष में मंत्री, सेनापति, स्वजन आदि सभी मौजूद थे। सबके सामने भोजन परोसा गया किंतु सिकंदर की थाली खाली थी। तभी महाराज पोरस ने आदेश दिया, ‘हमारे प्रिय अतिथि को इनका प्रिय भोजन परोसा जाए। आज्ञानुसार दूत भेषधारी सिकंदर की थाली में सोने की रोटियां और चांदी की कटोरियों में हीरे-मोती का चूर्ण परोसा गया। सभी ने भोजन शुरू किया, किंतु सिकंदर की आश्चर्य भरी निगाहें महाराज पर थीं। दूत को परेशान देख महारोज पोरस बोले, ‘खाइए न राजदूत, इससे महंगा भोजन प्रस्तुत करने में हम असमर्थ हैं।
महाराज पोरस के इस वचन को सुनकर विश्व विजय का सपना देखने वाला सिकंदर गुस्से से लाल हो गया और बोला, ‘ये क्या मज़ाक है पौरवराज।’ ‘यह कोई मज़ाक नहीं, आपका प्रिय भोजन है। ये सोने की रोटियां ले जाकर अपने सम्राट सिकंदर को देना और कहना कि सिंधु नरेश ने आपका प्रिय भोजन भिजवाया हैमहाराज बोले। यह सुनकर सिकंदर तिलमिला उठा, ‘आज तक किसी ने सोने, चांदी, हीरे-मोती का भोजन किया है जो मैं करूं?’
मेरे प्यारे मित्र सिकंदर, जब तुम ये जानते हो कि मनुष्य का पेट अन्न से भरता है, सोने-चांदी, हीरे-मोती से नहीं भरता, फिर तुम यों लाखों घर उजाड़ते हो?’ महाराज पोरस बड़े शांतचित होकर बोल रहे थे। मित्र उन्हें तो पसीने की खाद और शांति की हवा चाहिए। जिसे तुम उजाड़ते, नष्ट करते घूम रहे हो, तुम्हें सोने-चांदी की भूख ज़्यादा थी, इसलिए मैंने यह भोजन बनवाया था।अपने पहचाने जाने पर सिकंदर घबरा गया। परंतु महाराज पोरस ने बिना किसी विरोध व क्षति के सिकंदर को सम्मान सहित उसकी सेना तक भिजवा दिया।
 

जब पोरस ने सिकन्दर(Alexander) के सर से विश्व-विजेता बनने का भूत उतारा...

जितना बड़ा अन्याय और धोखा इतिहासकारों ने महान पोरस के साथ किया है उतना बड़ा अन्याय इतिहास में शायद ही किसी के साथ हुआ होगा।एक महान नीतिज्ञ, दूरदर्शी, शक्तिशाली वीर विजयी राजा को निर्बल और पराजित राजा बना दिया गया....
चूँकि सिकन्दर पूरे यूनान, ईरान, ईराक, बैक्ट्रिया आदि को जीतते हुए आ रहा था इसलिए भारत में उसके पराजय और अपमान को यूनानी इतिहासकार सह नहीं सके और अपने आपको दिलासा देने के लिए अपनी एक मन-गढंत कहानी बनाकर उस इतिहास को लिख दिए जो वो लिखना चाह रहे थे या कहें कि जिसकी वो आशा लगाए बैठे थे..यह ठीक वैसा ही है जैसा कि हम जब कोई बहुत सुखद स्वप्न देखते हैं और वो स्वप्न पूरा होने के पहले ही हमारी नींद टूट जाती है तो हम फिर से सोने की कोशिश करते हैं और उस स्वप्न में जाकर उस कहानी को पूरा करने की कोशिश करते हैं जो अधूरा रह गया था.. आलसीपन तो भारतीयों में इस तरह हावी है कि भारतीय इतिहासकारों ने भी बिना सोचे-समझे उसी यूनानी इतिहास को लिख दिया...
कुछ हिम्मत ग्रीक के फिल्म-निर्माता ओलिवर स्टोन ने दिखाई है जो उन्होंने कुछ हद तक सिकन्दर की हार को स्वीकार किया है..फिल्म में दिखाया गया है कि एक तीर सिकन्दर का सीना भेद देती है और इससे पहले कि वो शत्रु के हत्थे चढ़ता उससे पहले उसके सहयोगी उसे ले भागते हैं. इस फिल्म में ये भी कहा गया है कि ये उसके जीवन की सबसे भयानक त्रासदी थी और भारतीयों ने उसे तथा उसकी सेना को पीछे लौटने के लिए विवश कर दिया..चूँकि उस फिल्म का नायक सिकन्दर है इसलिए उसकी इतनी सी भी हार दिखाई गई है तो ये बहुत है, नहीं तो इससे ज्यादा सच दिखाने पर लोग उस फिल्म को ही पसन्द नहीं करते..वैसे कोई भी फिल्मकार अपने नायक की हार को नहीं दिखाता है.......
अब देखिए कि भारतीय बच्चे क्या पढ़ते हैं इतिहास में--"सिकन्दर ने पौरस को बंदी बना लिया था | उसके बाद जब सिकन्दर ने उससे पूछा कि उसके साथ कैसा व्यवहार किया जाय तो पौरस ने कहा कि उसके साथ वही किया जाय जो एक राजा के साथ किया जाता है अर्थात मृत्यु-दण्ड..सिकन्दर इस बात से इतना अधिक प्रभावित हो गया कि उसने वो कार्य कर दिया जो अपने जीवन भर में उसने कभी नहीं किए थे..उसने अपने जीवन के एक मात्र ध्येय, अपना सबसे बड़ा सपना विश्व-विजेता बनने का सपना तोड़ दिया और पौरस को पुरस्कार-स्वरुप अपने जीते हुए कुछ राज्य तथा धन-सम्पत्ति प्रदान किए..तथा वापस लौटने का निश्चय किया और लौटने के क्रम में ही उसकी मृत्यु हो गई.."
ये कितना बड़ा तमाचा है उन भारतीय इतिहासकारों के मुँह पर कि खुद विदेशी ही ऐसी फिल्म बनाकर सिकंदर की हार को स्वीकार कर रहे रहे हैं और हम अपने ही वीरों का इसतरह अपमान कर रहे हैं......!!
मुझे तो लगता है कि ये भारतीयों का विशाल हृदयतावश उनका त्याग था जो अपनी इतनी बड़ी विजय गाथा यूनानियों के नाम कर दी..भारत दयालु और त्यागी है यह बात तो जग-जाहिर है और इस बात का इससे बड़ा प्रमाण क्या हो सकता है..? क्या ये भारतीय इतिहासकारों की दयालुता की परिसीमा नहीं है..? वैसे भी रखा ही क्या था इस विजय-गाथा में; भारत तो ऐसी कितनी ही बड़ी-बड़ी लड़ाईयाँ जीत चुका है कितने ही अभिमानियों का सर झुका चुका है फिर उन सब विजय गाथाओं के सामने इस विजय-गाथा की क्या औकात.....है ना..?? उस समय भारत में पौरस जैसे कितने ही राजा रोज जन्मते थे और मरते थे तो ऐसे में सबका कितना हिसाब-किताब रखा जाय; वो तो पौरस का सौभाग्य था जो उसका नाम सिकन्दर के साथ जुड़ गया और वो भी इतिहास के पन्नों में अंकित हो गया(भले ही हारे हुए राजा के रुप में ही सही) नहीं तो इतिहास पौरस को जानती भी नहीं..
इतिहास सिकन्दर को विश्व-विजेता घोषित करती है पर अगर सिकन्दर ने पौरस को हरा भी दिया था तो भी वो विश्व-विजेता कैसे बन गया..? पौरस तो बस एक राज्य का राजा था..भारत में उस तरक के अनेक राज्य थे तो पौरस पर सिकन्दर की विजय भारत की विजय तो नहीं कही जा सकती और भारत तो दूर चीन,जापान जैसे एशियाई देश भी तो जीतना बाँकी ही था फिर वो विश्व-विजेता कहलाने का अधिकारी कैसे हो गया...?
जाने दीजिए....भारत में तो ऐसे अनेक राजा हुए जिन्होंने पूरे विश्व को जीतकर राजसूय यज्ञ करवाया था पर बेचारे यूनान के पास तो एक ही घिसा-पिटा योद्धा कुछ हद तक है ऐसा जिसे विश्व-विजेता कहा जा सकता है....तो.! ठीक है भाई यूनान वालों, संतोष कर लो उसे विश्वविजेता कहकर...!
महत्त्वपूर्ण बात ये कि सिकन्दर को सिर्फ विश्वविजेता ही नहीं बल्कि महान की उपाधि भी प्रदान की गई है और ये बताया जाता है कि सिकन्दर बहुत बड़ा हृदय वाला दयालु राजा था ताकि उसे महान घोषित किया जा सके क्योंकि सिर्फ लड़ कर लाखों लोगों का खून बहाकर एक विश्व-विजेता को महान की उपाधि नहीं दी सकती ना ; उसके अंदर मानवता के गुण भी होने चाहिए. इसलिए ये भी घोषित कर दिया गया कि सिकन्दर विशाल हृदय वाला एक महान व्यक्ति था..पर उसे महान घोषित करने के पीछे एक बहुत बड़ा उद्देश्य छुपा हुआ है और वो उद्देश्य है सिकन्दर की पौरस पर विजय को सिद्ध करना...क्योंकि यहाँ पर सिकन्दर की पौरस पर विजय को तभी सिद्ध किया जा सकता है जब यह सिद्ध हो जाय कि सिकन्दर बड़ा हृदय वाला महान व्यक्ति था..
अरे अगर सिकन्दर बड़ा हृदय वाला व्यक्ति होता तो उसे धन की लालच ना होती जो उसे भारत तक ले आई थी और ना ही धन के लिए इतने लोगों का खून बहाया होता उसने..इस बात को उस फिल्म में भी दिखाया गया है कि सिकन्दर को भारत के धन (सोने,हीरे-मोतियों) से लोभ था.. यहाँ ये बात सोचने वाली है कि जो व्यक्ति धन के लिए इतनी दूर इतना कठिन रास्ता तय करके भारत आ जाएगा वो पौरस की वीरता से खुश होकर पौरस को जीवन-दान भले ही दे देगा और ज्यादा से ज्यादा उसकी मूल-भूमि भले ही उसे सौंप देगा पर अपना जीता हुआ प्रदेश पौरस को क्यों सौंपेगा..और यहाँ पर यूनानी इतिहासकारों की झूठ देखिए कैसे पकड़ा जाती है..एक तरफ तो पौरस पर विजय सिद्ध करने के लिए ये कह दिया उन्होंने कि सिकन्दर ने पौरस को उसका तथा अपना जीता हुआ प्रदेश दे दिया दूसरी तरफ फिर सिकन्दर के दक्षिण दिशा में जाने का ये कारण देते हैं कि और अधिक धन लूटने तथा और अधिक प्रदेश जीतने के लिए सिकन्दर दक्षिण की दिशा में गया...बताइए कि कितना बड़ा कुतर्क है ये....! सच्चाई ये थी कि पौरस ने उसे उत्तरी मार्ग से जाने की अनुमति ही नहीं दी थी..ये पौरस की दूरदर्शिता थी क्योंकि पौरस को शक था कि ये उत्तर से जाने पर अपनी शक्ति फिर से इकट्ठा करके फिर से हमला कर सकता है जैसा कि बाद में मुस्लिम शासकों ने किया भी..पौरस को पता था कि दक्षिण की खूँखार जाति सिकन्दर को छोड़ेगी नहीं और सच में ऐसा हुआ भी...उस फिल्म में भी दिखाया गया है कि सिकन्दर की सेना भारत की खूँखार जन-जाति से डरती

 
 
है ..अब बताइए कि जो पहले ही डर रहा हो वो अपने जीते हुए प्रदेश यनि उत्तर की तरफ से वापस जाने के बजाय मौत के मुँह में यनि दक्षिण की तरफ से क्यों लौटेगा तथा जो व्यक्ति और ज्यादा प्रदेश जीतने के लिए उस खूँखार जनजाति से भिड़ जाएगा वो अपना पहले का जीता हुआ प्रदेश एक पराजित योद्धा को क्यों सौंपेगा....? और खूँखार जनजाति के पास कौन सा धन मिलने वाला था उसे.....? अब देखिए कि सच्चाई क्या है....
जब सिकन्दर ने सिन्धु नदी पार किया तो भारत में उत्तरी क्षेत्र में तीन राज्य थे-झेलम नदी के चारों ओर राजा अम्भि का शासन था जिसकी राजधानी तक्षशिला थी..पौरस का राज्य चेनाब नदी से लगे हुए क्षेत्रों पर था.तीसरा राज्य अभिसार था जो कश्मीरी क्षेत्र में था. अम्भि का पौरस से पुराना बैर था इसलिए सिकन्दर के आगमण से अम्भि खुश हो गया और अपनी शत्रुता निकालने का उपयुक्त अवसर समझा..अभिसार के लोग तटस्थ रह गए..इस तरह पौरस ने अकेले ही सिकन्दर तथा अम्भि की मिली-जुली सेना का सामना किया.."प्लूटार्च" के अनुसार सिकन्दर की बीस हजार पैदल सैनिक तथा पन्द्रह हजार अश्व सैनिक पौरस की युद्ध क्षेत्र में एकत्र की गई सेना से बहुत ही अधिक थी..सिकन्दर की सहायता फारसी सैनिकों ने भी की थी..कहा जाता है कि इस युद्ध के शुरु होते ही पौरस ने महाविनाश का आदेश दे दिया उसके बाद पौरस के सैनिकों ने तथा हाथियों ने जो विनाश मचाना शुरु किया कि सिकन्दर तथा उसके सैनिकों के सर पर चढ़े विश्वविजेता के भूत को उतार कर रख दिया..पोरस के हाथियों द्वारा यूनानी सैनिकों में उत्पन्न आतंक का वर्णन कर्टियस ने इस तरह से किया है--इनकी तुर्यवादक ध्वनि से होने वाली भीषण चीत्कार न केवल घोड़ों को भयातुर कर देती थी जिससे वे बिगड़कर भाग उठते थे अपितु घुड़सवारों के हृदय भी दहला देती थी..इन पशुओं ने ऐसी भगदड़ मचायी कि अनेक विजयों के ये शिरोमणि अब ऐसे स्थानों की खोज में लग गए जहाँ इनको शरण मिल सके.उन पशुओं ने कईयों को अपने पैरों तले रौंद डाला और सबसे हृदयविदारक दृश्य वो होता था जब ये स्थूल-चर्म पशु अपनी सूँड़ से यूनानी सैनिक को पकड़ लेता था,उसको अपने उपर वायु-मण्डल में हिलाता था और उस सैनिक को अपने आरोही के हाथों सौंप देता था जो तुरन्त उसका सर धड़ से अलग कर देता था. इन पशुओं ने घोर आतंक उत्पन्न कर दिया था.....

इसी तरह का वर्णन "डियोडरस" ने भी किया है --विशाल हाथियों में अपार बल था और वे अत्यन्त लाभकारी सिद्ध हुए..उन्होंने अपने पैरों तले बहुत सारे सैनिकों की हड्डियाँ-पसलियाँ चूर-चूर कर दी. हाथी इन सैनिकों को अपनी सूँड़ों से पकड़ लेते थे और जमीन पर जोर से पटक देते थे..अपने विकराल गज-दन्तों से सैनिकों को गोद-गोद कर मार डालते थे...
इन पशुओं का आतंक उस फिल्म में भी दिखाया गया है..
अब विचार करिए कि डियोडरस का ये कहना कि उन हाथियों में अपार बल था और वे अत्यन्त लाभकारी सिद्ध हुए ये क्या सिद्ध करता है..फिर "कर्टियस" का ये कहना कि इन पशुओं ने आतंक मचा दिया था ये क्या सिद्ध करता है...? अफसोस की ही बात है कि इस तरह के वर्णन होते हुए भी लोग यह दावा करते हैं कि पौरस को पकड़ लिया गया और उसके सेना को शस्त्र त्याग करने पड़े... एक और विद्वान ई.ए. डब्ल्यू. बैज का वर्णन देखिए-उनके अनुसार झेलम के युद्ध में सिकन्दर की अश्व-सेना का अधिकांश भाग मारा गया था.सिकन्दर ने अनुभव कर लिया कि यदि अब लड़ाई जारी रखूँगा तो पूर्ण रुप से अपना नाश कर लूँगा. अतः सिकन्दर ने पोरस से शांति की प्रार्थना की -"श्रीमान पोरस मैंने आपकी वीरता और सामर्थ्य स्वीकार कर ली है..मैं नहीं चाहता कि मेरे सारे सैनिक अकाल ही काल के गाल में समा जाय. मैं इनका अपराधी हूँ,....और भारतीय परम्परा के अनुसार ही पोरस ने शरणागत शत्रु का वध नहीं किया.----ये बातें किसी भारतीय द्वारा नहीं बल्कि एक विदेशी द्वारा कही गई है..
और इसके बाद भी अगर कोई ना माने तो फिर हम कैसे मानें कि पोरस के सिर को डेरियस के सिर की ही भांति काट लाने का शपथ लेकर युद्ध में उतरे सिकन्दर ने न केवल पोरस को जीवन-दान दिया बल्कि अपना राज्य भी दिया... सिकन्दर अपना राज्य उसे क्या देगा वो तो पोरस को भारत के जीते हुए प्रदेश उसे लौटाने के लिए विवश था जो छोटे-मोटे प्रदेश उसने पोरस से युद्ध से पहले जीते थे...(या पता नहीं जीते भी थे या ये भी यूनानियों द्वारा गढ़ी कहानियाँ हैं) इसके बाद सिकन्दर को पोरस ने उत्तर मार्ग से जाने की अनुमति नहीं दी. विवश होकर सिकन्दर को उस खूँखार जन-जाति के कबीले वाले रास्ते से जाना पड़ा जिससे होकर जाते-जाते सिकन्दर इतना घायल हो गया कि अंत में उसे प्राण ही त्यागने पड़े..इस विषय पर "प्लूटार्च" ने लिखा है कि मलावी नामक भारतीय जनजाति बहुत खूँखार थी..इनके हाथों सिकन्दर के टुकड़े-टुकड़े होने वाले थे लेकिन तब तक प्यूसेस्तस और लिम्नेयस आगे आ गए. इसमें से एक तो मार ही डाला गया और दूसरा गम्भीर रुप से घायल हो गया...तब तक सिकन्दर के अंगरक्षक उसे सुरक्षित स्थान पर ले गए..
स्पष्ट है कि पोरस के साथ युद्ध में तो इनलोगों का मनोबल टूट ही चुका था रहा सहा कसर इन जनजातियों ने पूरी कर दी थी..अब इनलोगों के अंदर ये तो मनोबल नहीं ही बचा था कि किसी से युद्ध करे पर इतना भी मनोबल शेष ना रह गया था कि ये समुद्र मार्ग से लौटें...क्योंकि स्थल मार्ग के खतरे को देखते हुए सिकन्दर ने समुद्र मार्ग से जाने का सोचा और उसके अनुसंधान कार्य के लिए एक सैनिक टुकड़ी भेज भी दी पर उनलोगों में इतना भी उत्साह शेष ना रह गया था फलतः वे बलुचिस्तान के रास्ते ही वापस लौटे....
अब उसके महानता के बारे में भी कुछ विद्वानों के वर्णन देखिए...
एरियन के अनुसार जब बैक्ट्रिया के बसूस को बंदी बनाकर सिकन्दर के सम्मुख लाया गया तब सिकन्दर ने अपने सेवकों से उसको कोड़े लगवाए तथा उसके नाक और कान काट कटवा दिए गए.बाद में बसूस को मरवा ही दिया गया.सिकन्दर ने कई फारसी सेनाध्यक्षों को नृशंसतापूर्वक मरवा दिया था.फारसी राजचिह्नों को धारण करने पर सिकन्दर की आलोचना करने के लिए उसने अपने ही गुरु अरस्तु के भतीजे कालस्थनीज को मरवा डालने में कोई संकोच नहीं किया.क्रोधावस्था में अपने ही मित्र क्लाइटस को मार डाला.उसके पिता का विश्वासपात्र सहायक परमेनियन भी सिकन्दर के द्वारा मारा गया था..जहाँ पर भी सिकन्दर की सेना गई उसने समस्त नगरों को आग लगा दी,महिलाओं का अपहरण किया और बच्चों को भी तलवार की धार पर सूत दिया..ईरान की दो शाहजादियों को सिकन्दर ने अपने ही घर में डाल रखा था.उसके सेनापति जहाँ-कहीं भी गए अनेक महिलाओं को बल-पूर्वक रखैल बनाकर रख लिए...
तो ये थी सिकन्दर की महानता....इसके अलावे इसके पिता फिलिप की हत्या का भी शक इतिहास ने इसी पर किया है कि इसने अपनी माता के साथ मिलकर फिलिप की हत्या करवाई क्योंकि फिलिप ने दूसरी शादी कर ली थी और सिकन्दर के सिंहासन पर बैठने का अवसर खत्म होता दिख रहा था..इस बात में किसी को संशय नहीं कि सिकन्दर की माता फिलिप से नफरत करती थी..दोनों के बीच सम्बन्ध इतने कटु थे कि दोनों अलग होकर जीवन बीता रहे थे...इसके बाद इसने अपने सौतेले भाई को भी मार डाला ताकि सिंहासन का और कोई उत्तराधिकारी ना रहे...

तो ये थी सिकन्दर की महानता और वीरता....
इसकी महानता का एक और उदाहरण देखिए-जब इसने पोरस के राज्य पर आक्रमण किया तो पोरस ने सिकन्दर को अकेले-अकेले यनि द्वंद्व युद्ध का निमंत्रण भेजा ताकि अनावश्यक नरसंहार ना हो और द्वंद्व युद्ध के जरिए ही निर्णय हो जाय पर इस वीरतापूर्ण निमंत्रण को सिकन्दर ने स्वीकार नहीं किया...ये किमवदन्ती बनकर अब तक भारत में विद्यमान है.इसके लिए मैं प्रमाण देने की आवश्यकता नहीं समझता हूँ..
अब निर्णय करिए कि पोरस तथा सिकन्दर में विश्व-विजेता कौन था..? दोनों में वीर कौन था..? दोनों में महान कौन था..? यूनान वाले सिकन्दर की जितनी भी विजय गाथा दुनिया को सुना ले सच्चाई यही है कि ना तो सिकन्दर विश्वविजेता था ना ही वीर(पोरस के सामने) ना ही महान(ये तो कभी वो था ही नहीं)....
जिस पोरस ने सिकन्दर जो लगभग पूरा विश्व को जीतता हुआ आ रहा था जिसके पास उतनी बड़ी विशाल सेना थी जिसका प्रत्यक्ष सहयोग अम्भि ने किया था उस सिकन्दर के अभिमान को अकेले ही चकना-चूरित कर दिया,उसके मद को झाड़कर उसके सर से विश्व-विजेता बनने का भूत उतार दिया उस पोरस को क्या इतिहास ने उचित स्थान दिया है......!...?
भारतीय इतिहासकारों ने तो पोरस को इतिहास में स्थान देने योग्य समझा ही नहीं है.इतिहास में एक-दो जगह इसका नाम आ भी गया तो बस सिकन्दर के सामने बंदी बनाए गए एक निर्बल निरीह राजा के रुप में..नेट पर भी पोरस के बारे में पर्याप्त जानकारी उपलब्ध नहीं है.....
आज आवश्यकता है कि नेताओं को धन जमा करने से अगर अवकाश मिल जाय तो वे इतिहास को फिर से जाँचने-परखने का कार्य करवाएँ ताकि सच्चाई सामने आ सके और भारतीय वीरों को उसका उचित सम्मान मिल सके..मैं नहीं मानता कि जो राष्ट्र वीरों का इस तरह अपमान करेगा वो राष्ट्र ज्यादा दिन तक टिक पाएगा...मानते हैं कि ये सब घटनाएँ बहुत पुरानी हैं इसके बाद भारत पर हुए अनेक हमले के कारण भारत का अपना इतिहास तो विलुप्त हो गया और उसके बाद मुसलमान शासकों ने अपनी झूठी-प्रशंसा सुनकर आनन्द प्राप्त करने में पूरी इतिहास लिखवाकर खत्म कर दी और जब देश आजाद हुआ भी तो कांग्रेसियों ने इतिहास लेखन का काम धूर्त्त अंग्रेजों को सौंप दिया ताकि वो भारतीयों को गुलम बनाए रखने का काम जारी रखे और अंग्रेजों ने इतिहास के नाम पर काल्पनिक कहानियों का पुलिंदा बाँध दिया ताकि भारतीय हमेशा यही समझते रहें कि उनके पूर्वज निरीह थे तथा विदेशी बहुत ही शक्तिशाली ताकि भारतीय हमेशा मानसिक गुलाम बने रहें विदेशियों का,पर अब तो कुछ करना होगा ना..??? इस लेख से एक और बात सिद्ध होती है कि जब भारत का एक छोटा सा राज्य अगर अकेले ही सिकन्दर को धूल चटा सकता है तो अगर भारत मिलकर रहता और आपस में ना लड़ता रहता तो किसी मुगलों या अंग्रेजों में इतनी शक्ति नहीं थी कि वो भारत का बाल भी बाँका कर पाता.कम से कम अगर भारतीय दुश्मनों का साथ ना देते तो भी उनमें इतनी शक्ति नहीं थी कि वो भारत पर शासन कर पाते.भारत पर विदेशियों ने शासन किया है तो सिर्फ यहाँ की आपसी दुश्मनी के कारण..
भारत में अनेक वीर पैदा हो गए थे एक ही साथ और यही भारत की बर्बादी का कारण बन गया क्योंकि सब शेर आपस में ही लड़ने लगे...महाभारत काल में इतने सारे महारथी, महावीर पैदा हो गए थे तो महाभारत का विध्वंशक युद्ध हुआ और आपस में ही लड़ मरने के कारण भारत तथा भारतीय संस्कृति का विनाश हो गया उसके बाद कलयुग में भी वही हुआ..जब भी किसी जगह वीरों की संख्या ज्यादा हो जाएगी तो उस जगह की रचना होने के बजाय विध्वंश हो जाएगा... पर आज जरुरत है भारतीय शेरों को एक होने की...........क्योंकि अभी भारत में शेरों की बहुत ही कमी है और जरुरत है भारत की पुनर्रचना करने की......

-डा. दिनेश अग्रवाल
प्राध्यापक, यूनिवर्सिटी आफ पेन्सिलवेनिया
भारतीय इतिहास संकलन योजना द्वारा गत दिनों हिमाचल प्रदेश में आयोजित एक परिसंवाद में विद्वानों का निष्कर्ष था कि सिकंदर विश्वविजेता नहीं था बल्कि वह डोगराओं के हाथों जम्मू में पराजित हुआ था। पाञ्चजन्य के 12 नवम्बर, 2006 के अंक में हमने उस परिसंवाद की विस्तृत रपट प्रकाशित की थी। इसी विषय पर डा. दिनेश अग्रवाल ने कुछ समय पूर्व एक शोधपरक आलेख लिखा था। डा. अग्रवाल न्यूयार्क (अमरीका) में स्टेट कालेज (यूनिवर्सिटी आफ पेन्सिलवेनिया) में प्रोफेसर हैं। यहां हम डा. दिनेश अग्रवाल के उसी आलेख "एलेक्जेंडर: द आर्डिनेरी" का अनूदित अंश प्रकाशित कर रहे हैं- सं.
"सिकन्दर ने भारत में कभी विजय प्राप्त नहीं की", इतिहास के धुंधलके में छिपा यह सत्य अब छन-छन कर बाहर आ रहा है। वास्तव में सिकन्दर तो पंजाब के तत्कालीन राजा पोरस से पराजित हुआ था। उसे अपने सैनिकों की प्राणरक्षा के लिए पोरस से एक सन्धि भी करनी पड़ी। क्योंकि पोरस की सेना के हाथों बड़ी संख्या में अपने सहयोगियों को मरता देख उसकी सेना में खलबली मच गई थी।
अपने विश्व-विजय अभियान में अनेक युद्ध जीतते हुए सिकन्दर ने फारस के राजा को हराने के बाद भारत पर हमला किया। उसने सिन्धु नदी पार की। तक्षशिला का तत्कालीन राजा आम्भी उससे आ मिला। आम्भी ने स्वयं ही सिकन्दर के सामने आत्मसमर्पण किया था क्योंकि वह पोरस से शत्रुता रखता था और सिकन्दर की सहायता से वह पोरस को हराना चाहता था। सिकन्दर की दु:खद पराजय और भारत में उसके विश्व-विजय के सपने के चूर-चूर हो जाने की कहानी की वास्तविकता को दरअसल ग्रीक इतिहासकारों ने छिपाया। ब्रिटिश राज्य में भी इतिहासकारों ने यही रुख अपनाया, लेकिन जैसा कि सत्य एक न एक दिन सामने आकर ही रहता है। अनेक यूरोपीय विद्वानों व इतिहासकारों द्वारा लिखे गए वृत्तान्त इस सन्दर्भ में दस्तावेज उपलब्ध कराते हैं और इतिहास के सामने एक भिन्न तस्वीर प्रस्तुत करते हैं। कर्टियस, जस्टिन, डियोडोरस, ऐरियन और प्लूटार्क जैसे विद्वान इस सन्दर्भ में विश्वसनीय और प्रामाणिक जानकारी उपलब्ध कराते हैं कि सिकन्दर पोरस से पराजित हुआ था और उसे अपनी तथा अपने सैनिकों की जीवन रक्षा के लिए पोरस से सन्धि करनी पड़ी थी। भारत का "विजय अभियान" उसके लिए दुर्भाग्यपूर्ण सिद्ध हुआ और भारत से वापसी के समय उसकी सारी आशाएं धूमिल हो चुकी थीं।
इथियोपिक साहित्य में ई.ए.डब्ल्यू. बैस द्वारा लिखित "द लाइफ एण्ड एक्सप्लोइट्स आफ एलेक्जेण्डर" नामक दस्तावेज में निम्नलिखित विवरण मिलता है। "झेलम की लड़ाई में सिकन्दर की भयानक सैन्य हानि हुई, बड़ी संख्या में उसके सैनिक मारे गए। सिकन्दर ने महसूस किया कि अगर उसने लड़ाई जारी रखी तो वह पूरी तरह समाप्त हो जायेगा। उसने पोरस से युद्ध रोकने का आग्रह किया। पोरस भारतीय परम्परा का सच्चा वाहक था इसलिए उसने शरण में आए शत्रु का वध करना उचित नहीं समझा। इसके बाद दोनों में एक समझौता हुआ और सिकन्दर ने उसके राज्य में अन्य क्षेत्रों को जोड़ने में सहायता की।"
श्री बैस आगे लिखते हैं-"सिकन्दर के सैनिक बुरी तरह टूट चुके थे और बड़ी संख्या में अपने साथियों की शहादत पर वे विलाप करने लगे थे। उन्होंने अपने हथियार फेंक दिये और आत्मसमर्पण के लिए आतुर हो उठे। लड़ने की उनमें तनिक मात्र इच्छा शेष नहीं थी। अपने सैनिकों की ऐसी मनोदेशा देखकर सिकन्दर ने भी युद्ध न करना ही उचित समझा और उसने पोरस से स्वयं निवेदन किया कि मुझे क्षमा कर दो। तुम्हारी बहादुरी व ताकत को मैं जान चुका हूं। अब मैं और दु:ख नहीं झेल सकता। मैं अपना जीवन समाप्त करना चाहता हूं। मैं नहीं चाहता कि मेरे सैनिकों की भी हालत मेरे जैसी हो। अपने सैनिकों को मौत के मुंह में धकेलने का मैं अपराधी हूं। किसी राजा के लिए इससे ज्यादा दु:खद क्या हो सकता है कि वह अपने सैनिकों को मौत के मुंह में धकेलने का जिम्मेदार सिद्ध हो।"
क्या यही है "सिकन्दर महान!" ये क्या किसी विजयी सिकन्दर के शब्द हैं जिसने पोरस पर विजय प्राप्त की? क्या कोई विश्वविजेता इस तरह के शब्द बोल सकता है? इतिहास की पुस्तकों में लोगों को सिकन्दर की जिस "विजय" और "पराक्रम" का वर्णन मिलता है वह उपरोक्त उद्धरण से कतई मेल नहीं खाता। हममें से अधिकांश लोगों ने स्कूली पुस्तकों में पढ़ा है कि सिकन्दर ने पोरस को पराजित किया था और इस बात की उसके मन में पीड़ा थी कि संसार में विजय के लिए अब कोई भू-भाग बचा नहीं है। शायद इसीलिए वह इतिहास में "सिकन्दर महान" कहा गया। लेकिन सिकन्दर के सन्दर्भ में प्राप्त नये दस्तावेज इस मिथक व मान्यता को झुठलाते हुए बताते हैं वास्तव में सिकन्दर उतना महान नहीं था जितना बताया जाता है। वह सिर्फ एक साधारण सिकन्दर ही था।
एक और मिथक, जो पाश्चात्य इतिहासकारों ने सिकन्दर के बारे में फैलाया है, वह यह है कि सिकन्दर बहुत बुद्धिमान व दयालु राजा था और उसके मन में बहादुर व साहसी लोगों के लिए बहुत आदर का भाव था। ऐसी और भी बातें कहीं जाती हैं जबकि वास्तविकता कुछ और है। न तो वह बहुत बुद्धिमान था और न दयालु। दस्तावेज बताते हैं कि वह बहुत क्रूर शासक था और अपने शत्रुओं को कड़े से कड़ा दण्ड देता था। जैसे बैक्ट्रिया का राजा बसूस अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए बड़ी बहादुरी के साथ सिकन्दर से लड़ा। युद्ध में पराजित होने के बाद जब एक कैदी के रूप में उसे सिकन्दर के सामने लाया गया, सिकन्दर ने अपने सैनिकों को उस पर कोड़े बरसाने तथा बाद में उसके कान व नाक काटने का आदेश दिया। बड़ी निर्दयता से सिकन्दर ने उसका वध किया। इसी प्रकार बहुत सारे फारसी सेना के सेनापति उसके हाथों मारे गए। अरस्तु के भांजे कलस्थनीज को सिकन्दर ने इसलिए मारा क्योंकि उसने फारसी राजाओं की नकल करते हुए सिकन्दर की आलोचना की थी। सिकन्दर ने अपने मित्र क्लाइट्स की भी हत्या क्रोध में आकर की। अपने पिता के विश्वासपात्र योद्धा पर्मेनियन को भी सिकन्दर ने मौत के घाट उतारा। इसी प्रकार भारतीय योद्धाओं, जो मसंगा से लौट रहे थे, का अंधेरी रात में सिकन्दर ने क्रूरतापूर्वक वध किया। ये "पराक्रम" सिकन्दर की महानता व दयालुता की कहानी नहीं कहते बल्कि उसे एक साधारण आक्रमणकारी और साम्राज्यवादी ही सिद्ध करते हैं।

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8 टिप्‍पणियां:

  1. Bastav hamare yaduvans m bhut mahan mhan raja hue unka itihas davaya gya hai sch av pta chl raha jai yaduvanshi

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  2. Ajkal charwahe gaderiya log yadav likh ke krishnvanshi to nahi ban paye...magar charwaho gaderiya nand vanshi or gwalvanshi gwaro ko itna bhi nahi pata ki yadav sirf yadu ke vansaj ko bola gaya he....puru vansh kaurav pandav or raja poras abimanyu parikchit angpal tomar ka yaduvansh ya yadav se koi lena dena nahi he...
    Raja yayati ke 5 bete the or sbse alag alag vansh chala he gwaro tum zahail log sbko ek hi vansh me gin rahe ho gwaro...yadav or yaduvshi sirf raja yadu ke vansajo ko nam he ...yadu ke bahi puru se puruvansh chala tha isliye raja poras nam pada kyuki wo puruvanshi raja tha wo yadav nahi the na hi yadu ke vansaj the...yayti ke 5 bete se
    Yaduvsnh...puruvansh...yavan...bhojvansh jaise vans chale he....
    Padhayi likhayi karlo gwaro...charwahe zahil hone ka sabut bar bar mat diya karo...duniya hasti he tun charwaho gaderiya pe ki kitni mathapachi parte ho magar chusra ke chudra hi mane jate ho...bhosdiwalo padhayi likhayi kar na to tumlog kshtriya dharam ko jante ho na kshtriya vansh kaise cahlta he tumlogo malum hoga...magar gaderiya rai mandal se yadav likhna or har vansh ko yadu ke vansh me ghusa dena sikh liye ...charwaho padho kisi achhe scool me...ya fir mahbahart hi ek bar padh lo gita padh lo...net pe gand marate firte jo kitab padh le sahi jankari milegi

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  3. इतिहाश कारों को यदुबंश का गुड़गान करने में बहुत तकलीफ थी। वो यदुवंश को नही देख सकते थे । ये सब ब्राह्मणों की चाल ब्राह्मण कभी यदुवंशियों की गाथा न सुन सकता न कर सकता।

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  4. राजपूत जिसको राजा देखते सबको बाप बनाने दौड़ पड़ते है मेरा बाप मेरा बाप , उन्हें कूछ भी इतिहास पता नहीं होता है, और ना ही वेदों और पुराणों का ज्ञान। बेटा एक भी लड़ाई तुम्हे मुगलों से नहीं जीता है। 17 राजपूत राजाओं अपनी बेटियां मुगलों को बेंच दिया था। कोई जोर जबरदस्ती नहीं था। दो है राजा मुगलों से लदे थे , एक राणा सांगा और दूसरे महाराणा प्रताप और दोनों की ही पराजय हुई थी। पराजय तक तो ठीक है वो तो किसी एक का होना ही है परन्तु दोनों ने युद्ध भूमि छोड़कर भाग गए थे, किसी एक भी वीरगति नहीं प्राप्त हुई थीं। अंग्रेजो के साथ चाटुकारिता करते तुम्हारा दिल नहीं ऊबा, इतनी गद्दारी की देश के साथ , की गद्दारी का तोहफा तुम्हे अंग्रेजो ने पहली राजपूत रेजीमेन्ट बना कर दी, जमीदार बनाए उसी अमीरी पर आज उछलते हो। गद्दारी तुम में कुट कूट के भरी है। यही छुपाने के लिए, तुम कभी यादवों को ,कभी जाटो को, कभी गुज्जरों को नीच दिखाकर , अपना उचा बनने का प्रयास करते हो। एक मात्र डोंग कि हम राजपूत है तो हम ही असली क्षत्रिय है के अलावा कोई भी इतिहास नहीं hei सिर्फ गद्दारी के। सारे यदुवंशी राजाओं को अपना बाप बताते हो। और फिर यादवों को अहीर , और पता नहीं क्या क्या बताकर अपने आपको ऊंचा दिखाने की चेष्टा करते हो। मै एक ब्राह्मण हूं और बता दू कि यादवों का इतिहास वेदों पुराणों, उपनिषदों , लिखित इतिहास जितने भी है सबसे अधिक गौरवशाली रहा है। हर किसी राजा को अपना बाप बना लेने से तुम्हारी इस देश के साथ की हुए गद्दारी का इतिहास समाप्त नहीं हो जाएगा। जब भी तुम अपना इतिहास पढ़ोगे शर्म ही आएगी। मुगलों को अपनी बेटियां बेचने वाले

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